Thursday, 16 June 2016

घटानेे काेे घटा देना (कक्षा 2 - पाठ 7)

अगर आप हर साल के सर्वे में यह सुनते हैं कि बच्‍चे गणित में कमजोर हैं, उनहें गणित की बुनियादी संक्रियाएं ठीक से करना नहीं आता तो इसमें हैरान होने की कोई बात होनी नहीं चाहिए। क्‍योंकि उनके लिए किताबें बनाने वालों को भी गणित ठीक से नहीं आती। अब जिसे खुद गणित ठीक से नहीं आती वह दूसरों को गणित सिखाने की किताब कैसी लिखेगा, घटाना सिखाने का एक और तरीका इस बात का ज्‍वलंत उदाहरण है। इस पन्‍ने पर दिए गए घटाने के तरीके की कुछ समस्‍याएं इस तरह से हैं –

1.      चित्र में इकाई व दहाई में कोई फर्क नहीं दिखता। एक इकाई के लिए भी भी एक डंडी और एक दहाई के लिए भी एक डंडी। चित्र देख कर बच्‍चे इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि इकाई व दहाई में बराबर मात्रा होती है। यानी एक इकाई बराबर एक दहाई।
2.      यह चित्र इकाई व दहाई के फर्क व दोनों के संबंधों को बच्‍चों के सामने दर्शाने से परहेज करता है। वह संबंध यह है, कि दहाई, इकाई का दस गुना होता है और एक दहाई में दस इकाइयां होती है। दहाई की इकाई, दस इकाइयों को मिलाने से बनती है। इस संबंध को दर्शाने के लिए इकाई के लिए एक डंडी तथा दहाई को दर्शाने के लिए दस डंडी का गट्ठर बनाना जरूरी होता है। लेखक इस संबंध को बच्‍चों की नजर से क्‍यों छुपाना चााहते हैं, यह बात समझ से परे है।
3.      औपचारिक घटाने को समझने के लिहाज से किया गया दृश्‍यीकरण नाकाफी व आधा अधूरा है। इसमें मोटे तौर पर तीन समस्‍याएं हैं।
a.       पहली, चित्र में संख्‍याओं को ठीक से दर्शाया नहीं गया। जैसे 27 के सामने 2 व 7 डंडियां बनी है। यानी आप डंडियों को देख कर 27 का मतलब अपने मन में नहीं गढ़ सकते। इसके लिए जिस स्‍तर का अमूर्तीकरण आपको करना पड़ेगा व जिस तरह की भाषा इस्‍तेमाल करनी पड़ेगी वह कक्षा दो के बच्‍चे के लिए मुमकिन नहीं है। उसके लिए आसान है 2 व 7 को गिन कर 9 बता देना। यानी यह चित्र 27 को 9 में बदल देता हैै।
b.      दूसरी, दोनों संख्‍याओं के लिए अलग अलग चित्र नजर नहीं आते। यानी संख्‍या 15 को चित्रों में अलग से दर्शाया ही नहीं गया है। आप इस संख्‍या को चित्र में खोजने जाएंगे तो आपको विकट प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। आप अगर डंडियों के चित्रों में 15 को तलाशेंगे तो आपको 1 व 5 डंडी मिला कर छह डंडियां मिल जाएगा। उस 1 व 5 को 15 में बदलने के लिए फिर से जिस स्‍तर का अमूर्तीकरण व भाषा व समझ चाहिए वह कक्षा 2 के बच्‍चों के पास होनी मुमकिन नहीं है।
c.       तीसरी, इस दृश्‍यीकरण की सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि आप अनौपचारिक घटाना चीजों को निकाल कर या काट कर समझ सकते हैं लेकिन औपचारिक घटाने को समझने के लिए आपको दो संख्‍याओं की तुलना करके यह दिखलाना पड़ता है कि एक संख्‍या, दूसरी संख्‍या कितनी ज्‍यादा या कितनी कम है। लेखक गण, तुलना करके घटाना की अवधारणा से अनभिज्ञ जान पड़ते हैं।
4.       गणितीय प्रक्रियाओं को भाषा में ठीक से व्‍यक्‍त करना गणितीय संप्रेषण को बेहतर करने में मदद करता है। सवाल को समझाने के लिए लिखी गई भाषा मोटे तौर पर निरर्थक ढंग से गणनविधि का वर्णन करती है और निकाल कर घटाने का तर्क काम मे लेती है। वर्णन करते वक्‍त वह इकाई दहाई का फर्क भी झाड़ू मार कर साफ कर देती है और सिर्फ अंकों को ही घटाती है। यानी आप पढ़ कर यह समझ सकते हैं कि घटाते वक्‍त आपको सिर्फ अंकों को काटना पीटना है। इससे संख्‍या की मात्रा की कोई कल्‍पना इस वर्णन को पढ़ या सुन कर बच्‍चे के दिमाग में नहीं बनेगी। यह बात आगे हासिल के घटाव सिखाने में भी मुश्किल पैदा करेगी। आप एक ही आकार की दहाई व इकाई की डंडी से दस इकाइयां बाहर निकाल कर कैसे दिखाएंगे।
5.      आखिरी बात यह है कि प्रस्‍तुतीकरण में अंकों में लिखा सवाल भाषा में लिखी घटाने की प्रक्रिया से कटा हुआ है। भाषा में घटाने का वर्णन करते वक्‍त न तो लेखक यह बताते हैं कि सवाल क्‍या है, किस संख्‍या में से किसको घटाना है और अंत में कौनसी संख्‍या मिलती है। शब्‍दों में लिखे गए विवरण को पढ़ कर कहीं से भी यह पता नहीं चलता कि 27 में से 15 घटाने पर शेषफल 12 बचते हैं।

मुझे नहीं पता कि आपका ध्‍यान इस बात पर गया या नहीं कि लेखकों ने बीड़ा तो दो अंकीय घटाना सिखाने का उठाया था लेकिन सिखाते वक्‍त उन्‍होंने सिर्फ और सिर्फ एक अंकीय घटाना ही सिखाया है। इसलिए वे सिर्फ शुरूआत व आखिर में हल किया गया दो अंकीय सवाल लिख भर देते हैं लेकिन सिखाने की जमीन तोड़  कोशिश में कभी भी, कहीं भी, किसी भी तरह भूल कर भी दो अंकीय घटाने का कोई जिक्र करने से कोसों दूर ही रहते हैं। 

रवि कांत

Monday, 13 June 2016

एक तरफ एन.सी.ई.आर.टी.और एस.आई.ई.आर.टी.की पिछले वर्षों में चल रही पुस्तकें हैं, जो आम लोगों के सपनो और संघर्षों से बच्चों का परिचय कराती हैं | ताकि आम गरीब बच्चे भी बड़े सपने देख सकें और उसके लिए मेहनत कर सकें | दूसरी ओर एस.आई.ई.आर.टी.की नई पुस्तकें, सत्ता में बैठे तानाशाओं के हितों को साधने का प्रयास करती नजर आती है | नई पुस्तकों का यह प्रयास स्पष्ट रूप में नजर आता है कि आम जनता बेवकूफ बनी रहे,तथाकथित, नकली साधु-संतों के प्रवचन सुनती रहें और पाप-पुण्य के फेर में पड़ी रहे..

  1. एन.सी.ई.आर.टी.-ई.वी.एस.की कक्षा 3,4,5 की पुस्तकों में आम लोगों के संघर्षो से बच्चे प्रभावित हो पाएं इस ऊद्देश्य के लिए लगभग छ: पाठों में आम लोगों की विशेष उपलब्धियों से बच्चों का परिचय कराया गया है | जैसे कि कक्षा चार के पाठ चार में अमृता की कहानी है जिसने राजस्थान के जोधपुर जिले में पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी | इस कहानी से शुरू करके कक्षा 5 के पाठ 17 में अफसाना मंसूरी की कहानी है जो कि झुग्गी से निकल कर, बास्केटबाल के कोर्ट तक पहुँच जाती है |
  2. एस.आई.ई.आर.टी.की पिछले वर्ष चल रही,कक्षा 3,4,5 की पुस्तकों में, लगभग तीन पाठ हैं जिनके माध्यम से बच्चे कपड़ों का इतिहास,अंतरिक्ष यात्रा व पर्वतारोहण की यात्रा को समझते हुए, कल्पना  चावला,सुनीता विलियम व बछेन्द्री पाल, आदि से भी परिचित होते हैं | आम परिवारों के ऐसे व्यक्ति,  जैसे कि सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त व गीता से परिचित होते हैं जो कि पहलवानी के दम पर पदक लेकर आए हैं |
  3. एस.आई.ई.आर.टी.की कक्षा 3,4,5 की नई पुस्तकों के तीन पाठों में बच्चों को नागार्जुन,भगिनि निवेदिता,महात्मा गांधी,बिरसामुण्डा,चरक,सुश्रुत,रानी दुर्गावती,वीर सावरकर,सरदार बल्लभ भाई पटेल,डा.विक्रम साराभाई,जीजा बाई,डा.भीमराव अम्बेडकर व प.मदन मोहन मालवीय के बारे में बड़ी ही धूर्तता से बच्चों को जानकारी दी जाती है | तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर, बच्चों को उपदेश दिए जाते हैं | एक तरफ गांधी जी का परिचय बहुत ही सतही ढंग से दिया जाता है और अंत में बच्चों को दी गई जानकारी को याद रख पाने के उद्देश्यों से पूछे जाने वाले प्रश्नों की तुलना में बच्चों को यह निर्देश दिया जता है कि वें पुस्तकालय से श्रावण कुमार की पुस्तक ढूंढे और पढ़ें | दूसरी तरफ ‘वीर सावरकर’ जिनके बारे में सभी को पता है कि आजादी के लिए किए गए संघर्ष के समय जब इन्हें जेल में डाल दिया गया था तब ‘वीर सावरकर जी’ अंग्रेजों से माफ़ी मांगकर, जेल से छूटकर, आ गए थे | पर इस तथ्य को छिपाते हुए, पाठ को ऐसे बुना गया है कि इन्हें आजादी का हीरो बताया गया है | तोड़-मरोड़ कर पेश किए गए तथ्यों को बच्चे याद रख पाएँ, इस ऊद्देश्य के लिए प्रश्न भी बच्चों से किए गए हैं | जैसे कि वीर सावरकर ने विदेशी वस्तुओं की होली क्यों जलाई होगी? वीर सावरकर को वीर क्यों कहा गया?    

बच्चों से बात नहीं करती हिंदी की किताबें

शिक्षा को रटंत प्रणाली में मुक्त करने में लम्बी अकादमिक जद्दोजहद दुनिया भर में चली है. इस जद्दोजहद ने इस मूलभूत मान्यता से मुक्ति दिलाई कि बच्चे कोरी स्लेट या गीली मिट्टी मात्र नहीं होते. वे अपने सीखने कि प्रक्रिया में सक्रिय सहभागी होते हैं. किसी भी लिखित या अलिखित संसाधन, किसी भी शिक्षक या वयस्क की भूमिका उनके सीखने की इस प्रक्रिया में एक सुगमकर्ता या सहयोगी की होती है. इसलिए बच्चे क्या सीख सकते हैं इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि बच्चे पहले से उस विषय में क्या-क्या जानते हैं. इसके लिए यह ज़रूरी है कि यह संसाधन और व्यक्ति बच्चों को ऐसे अवसर अधिक से अधिक उपलब्ध कराएँ जिनमें बच्चे खुद को व्यक्त कर सकें. उनसे उनके परिवेश, उनके अनुभव से जुड़े प्रश्न पूछे जाएँ. उन्हें जिन नयी अवधारणाओं से परिचित कराया जाये उनके सन्दर्भ में उनके अनुभवों को टटोला जाये, उनके जरिये उन्हें कल्पनाओं की उड़ान भरने के मौके दिए जाएं. उन्हें स्वयं सोचने-समझने के अवसर दिए जाएँ.  

जहाँ तक भाषा सीखने का सवाल है, प्रत्येक बच्चा स्कूल आने से बहुत पहले से अपनी घर कि भाषा अपने परिवेश से अर्जित कर चुका होता है. किसी भाषा में सभी तरह के कौशल उसके पास पर्याप्त विकसित अवस्था में होते हैं. जैसे वे अपने मन की बात कहना, दूसरे की बात को सुन कर समझना, पूछे गए सवालों का जवाब देना, नए सवाल पूछना, निर्देशों का पालन करना, स्वयं निर्देश देना, कल्पना करना, तर्क करना, विश्लेषण. वर्गीकरण, करना, नयी बात कहना, रचना करना आदि तमाम तरह से भाषा का उपयोग करना जानते हैं. स्कूल में बच्चों को भाषा सिखाने के लिए शिक्षक का यह जानना ज़रूरी है कि बच्चा अपनी भाषा में क्या जानता है? उसका यह जानना उसे स्कूल में सिखाई जाने वाली भाषा, इस प्रसंग में हिंदी, सीखने में कैसे उपयोग में लाया जा सकता है? स्वाभाविक है कि पाठ्य पुस्तक को भी ऐसे अवसर रचने होंगे जिनके द्वारा बच्चे अपनी बात कह सकें. 

राजस्थान में शब्द भण्डार, वाक्य संरचना आदि के लिहाज से इस प्रदेश में बोली जाने वाली अधिकांश भाषाओँ और हिंदी भाषा में काफी समानताएं हैं. बच्चों के परिवेश में स्वाभाविक रूप से हिंदी भाषा को सुनने के अवसर भी मौजूद रहते हैं. इसलिए हिंदी की किताब और शिक्षक के पास ऐसे बहुत से अवसर मौजूद हैं जिन्हें बच्चे के अनुभव और भाषा से सीधे जोड़ा जा सके. भाषा महज अभिव्यक्ति या सम्प्रेषण का माध्यम नहीं, लेकिन अभिव्यक्ति या सम्प्रेषण भाषा का एक महत्वपूर्ण काम तो है. भाषा सीखने की प्रक्रिया में यह ज़रूरी है कि बच्चों को किसी नए कथ्य से परिचित कराने के दौरान उस कथ्य या उससे मिलती-जुलती परिस्थतियों के बारे में बच्चों से उनके अनुभवों पर चर्चा कि जाये, उन्हें अपनी बात को अपने शब्दों में कहने के अवसर दिए जाएँ, नयी कल्पना करने के अवसर दिए जाएँ, किताब में दी गयी बात को अपने तर्क कि कसौटी पर कसने के मौके दिए जाएँ. 

नयी भाषा को जानने और पढ़ना-लिखना सीखने में उनकी रूचि को बढ़ावा देने के लिए भाषा की पाठ्य पुस्तकों से आरंभिक कक्षाओं में यह अपेक्षा होती है कि उनमें भरपूर रुचिकर कविताएँ, कहानियां और ऐसी सामग्री हो जो बच्चों के अनुभव संसार के करीब हो और उसका विस्तार करे. तरह-तरह कि गतिविधियाँ हों जो उन्हें विभिन्न परिस्थितियों में सोचने-विचरने के अवसर दे, उनके सामने अपने विषय से जुड़ी नयी चुनौतियाँ रखें, ताकि वे कक्षा में चलने वाली प्रक्रियाओं के साथ जुड़ाव महसूस कर सकें और कालांतर में स्वयं पढ़ने और लिखने कि और प्रवृत्त हो सकें.

इस सन्दर्भ में राजस्थान राज्य कि हिंदी कि नयी पाठ्य पुस्तकें ऐसे कोई अवसर तो रचती ही नहीं हैं, बल्कि किताबें इस बात के लिए प्रतिबद्ध नज़र आती हैं कि कहीं ऐसे कोई अवसर बन तो नहीं रहे. कक्षा 1 से 8 तक की हिंदी भाषा कि यह किताबें नैतिक उपदेशों और स्वच्छता के बोझ तले बुरी तरह दबी हैं. कुछ पाठ जो अपनी पूर्ववर्ती किताब 'रुनझुन' से ज्यों-के-त्यों उठा लिए गए हैं, वे ही थोड़ी बहुत राहत देते हैं. पाठ कि विषय-वस्तु या अभ्यास के प्रश्नों के साथ यदि नयी पाठ्य-पुस्तक समिति ने थोड़ी भी छेड़छाड़ की तो उनका भी हश्र बाकि पाठों के जैसा बना के छोड़ा है. जो पाठ इस तरह की छेड़छाड़ से बच गए हैं उनमे ज़रूर इस तरह के प्रश्न और भाषा मिल जाते हैं जो बच्चों के साथ संवाद करती जान पड़ती हैं, जिनके प्रश्न बच्चे के अनुभव तक जाते हैं, उन्हें कल्पना के अवसर देते हैं. जैसे कक्षा 2 में कहानी 'सूरज का रुमाल'. लेकिन पूरी किताब में ऐसे पाठों कि संख्या बहुत सीमित है. वरना किताबों को बच्चों के खुद सोचने से इतना परहेज है कि कक्षा 2 की इसी किताब में पहेलियाँ दी है, लेकिन बच्चों को इन पहेलियों को बुझाने का मौका न मिल जाए इसलिए पहेली के साथ ही जवाबी वस्तु का चित्र भी बना कर दे दिया है. मानो इतने से भी तसल्ली न हुई हो इसलिए इन तीन पहेलियों के ठीक नीचे जवाब भी लिख कर पेश कर दिए हैं. 

यह पाठ्य पुस्तकें इस बात को सुनिश्चित कर देना चाहती है कि बच्चों को कहीं अपनी बात कहने, अपने विचारों और कल्पनाओं को व्यक्त करना या उनमें रंग भरना न आ जाये. कल्पनाओं में रंग भरने के विचार से तो किताब इस कदर आतंकित जान पड़ती हैं कि बच्चों को चित्र बनाने या चित्रों में रंग भरने तक के लिए अपने विवेक से रंग चुनने या अपनी कल्पना से चित्र बनाने का अवसर भी इन किताबों में नहीं हैं. कक्षा 2 कि किताब में छह जगह बच्चों कि पाठ से सम्बंधित चित्र बनाने के अवसर हैं, लेकिन सभी जगह नमूने का चित्र दिया गया है, जिसमे देख कर बच्चों को हु-ब-हु रंग भरना है. रंग भरने से पहले बच्चे चित्र को देख कर स्वेच्छा से चित्र बनाने न लग जाएँ इसलिए खाली जगह में बिंदु से चित्र बना दिए हैं, ताकि बच्चे उस पर पेन्सिल फिराते हुए ही चित्र को पूरा करें. किताब में चार जगह बच्चों के लिए खाली स्थान छोड़ा गया है जिनमें वे अपनी इच्छा से कुछ बना सकते हैं, लेकिन ऐसी जगहों पर निर्देशों में स्पष्टता नहीं है. जैसे बारिश पर कविता के बाद बच्चों से कागज़ कि नाव बनाने और पानी में तैराने को कहा गया है. इस निर्देश के नीचे एक खाली बॉक्स बना कर छोड़ दिया गया है. यह अनुमान ही लगाया जा सकता है कि यहाँ शायद बच्चों से बारिश से सम्बंधित या नाव का चित्र बनाने कि अपेक्षा कि गयी है शायद. 

पृष्ठ संख्या 100 पर अचानक किताब कल्पनाशीलता के प्रति अत्यंत उदार हो जाती है. इस पृष्ठ पर खाली बॉक्स के ऊपर निर्देश है "पुस्तक का यह पन्ना आपके लिए है. चित्र, कविता, कहानी ... जो मन करे उससे इस पन्ने को भरें." यह निर्देश दरअसल कुछ भी नहीं कहता. न कोई विषय सुझाता है, न कोई विधा बताता है. दो बरस तक जिन बच्चों को अपनी मर्ज़ी से एक चित्र न बनाने दिया हो, अपने मन से जवाब देने वाले प्रश्न भी गिने-चुने स्थानों पर ही पूछे गए हों, उनके सामने अचानक इस तरह का पूरी तरह खुला निर्देश बच्चों को कुछ बनाने या लिखने के लिए प्रेरित करेगा इसमे संदेह करना बेमानी नहीं. 

इस संशय कि बड़ी और पुख्ता वजह यह भी है कि इस निर्देश में बच्चों से कविता, कहानी लिखने की अपेक्षा कि गयी है. जबकि पहली कक्षा की पूरी किताब में एक भी कहानी नहीं है. कविताओं और कहानियों की भाषा पर बात फिर कभी. फिलहाल यह जान लेना महत्वपूर्ण है कि अनेक शैक्षिक अनुभवों और शोधों से यह प्रमाणित हो चुका है कि आरंभिक कक्षाओं में कविता-कहानी का उपयोग बच्चों में भाषा के प्रति लगाव को स्वाभाविक तौर पर बढ़ावा देता है. पहली कक्षा में एकमात्र कहानी "चित्र पठन" के रूप में दी गयी है. एक पन्ने पर चार चित्रों के माध्यम से कहानी "खट्टे अंगूर" को दर्शाया गया है. एक पंक्ति के निर्देश में चित्रों पर बातचीत कर कहानी बनाने को कहा गया है. कक्षा 2 में इसी कहानी को एक चित्र के साथ दस पंक्तियों कि कहानी के रूप में पेश कर दिया गया है. न पहली के चित्र सुरुचिपूर्ण. न दूसरी कक्षा में कहानी की भाषा सरस. पूरे एक साल के बाद उसी कहानी को दे कर किताब किन शैक्षिक लक्ष्यों को पाना चाहती है? किताब में दिए गए अभ्यास के प्रश्न बच्चों को खुद सोचने और लिखने या बताने के अवसर नहीं देती. जब स्कूल के सन्दर्भ में बच्चों को कल्पना के अवसर दिए ही नहीं हैं, तो बच्चे अचानक आई इस अपेक्षा को कैसे पूरी करेंगे? इसका कोई आधार किताब नहीं देती. 

- देवयानी भारद्वाज  


नई पाठ्य-पुस्तकों के लेखक अल्प-ज्ञानी हैं या बहुत लापरवाही से पाठों को लिखा गाय है ? 'पर्यावरण अध्ययन' कक्षा तीन के तीसरे घटक 'हम और हमारा खान-पान' से सम्बंधित पाठो को पढ़ने के दौरान,यह प्रश्न बार-बार मुझें परेशान करता रहा था !

1.एन.सी..आर.टी.की पुस्तक में इस घटक से सम्बंधित दो पाठ हैं | इन पाठों में कुल 8 चित्र हैं जो बच्चों को पर्यावरण के प्रति और ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं | 15 गतिविधियाँ है जो कि अध्ययन की प्रक्रिया पर बच्चों की पकड़ को मजबूत बनाते हुए, बच्चे अपने आस-पास व पूरी दुनिया में खाए जाने वाले खाद्य-पदार्थों से परिचित कराती हैं,बिना मतारोपण के | इन दो पाठों में कुल 18 प्रश्न है जिन पर बच्चों को बार-बार सोचने व चर्चा के अवसर उपलब्ध कराए गए हैं |
2.सत्र 2015-16 में चल रही, एस.आई..आर.टी.की पुस्तक में इस घटक से जुड़े तीन पाठ है | इन पाठों में 24 चित्र हैं, गतिविधियाँ हैं और 20 प्रश्न हैं | बच्चों की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पाठ को बहुत प्रभावी तरीकों से बुना गया है |
3.सत्र 2016-17 के लिए बनाई गई नई पाठ्य-पुस्तक में भी इस घटक से सम्बंधित दो पाठ है | इन पाठों में केवल 5 चित्र हैं,7 गतिविधियाँ हैं और 20 प्रश्न हैं | अधिकतर प्रश्नों को इस प्रकार से बनाया गया है कि इन प्रश्नों में बच्चे से सिर्फ पाठ में दी गई जानकारियों को याद रख लेने व बहुत ही सामान्य जानकारियों को बता देने की अपेक्षा की गई है |
नई पुस्तकों के इन पाठों को पढ़ते-पढ़ते मुझें एक घटना भी बार-बार याद आती रही थी | कुछ वर्षों पहले मैं 'केकड़ी'नगर में रहता था | कड़क सर्दी की एक शाम,एक मित्र के साथ 'मटन' खाने की इच्छा हुई | ऐसा भोजनालय खोजा गया | एक गली, फिर उसमें भी एक गली, गली के एकदम से लास्ट कोने में यह दुकान थी | हमने दुकान वाले से पूछा कि यार सभी तो दुकाने ऐसी जगह खोलते हैं जहां लोग आसानी से पहुँच सकें | आपने एकदम ऐसी छुपी हुई जगह पर खाने की दुकान क्यों खोली है ? उन्होंने बताया कि मेरी दुकान इस कारण से ही चलती है कि यह ऐसी जगह है | क्योंकि मेरे यहाँ जो ग्राहक आते हैं वे छुपकर ही खाने वाले लोग हैं |

नई पुस्तकों के लेखक हमारी नई पीढ़ी को ऐसा ही बनाना चाहते हैं ताकि इच्छा होने पर वें मांसाहारी खाना छिपकर हो खा सकें | क्योंकि नई पुस्तक के दोनों पाठो में बच्चों को यह जानकारी दी गई है कि राजस्थान के लोग विविधता के नाम पर या तो बाजरा खाते हैं या गेंहूँ खाते हैं या मक्का खाते हैं या चावल खाते हैं | मछली व समुंद्री जीव तो समुन्द्र के पास रहने वाले खाते हैं | ये ही नहीं जो समाज में परम्परा से चला आ रहा है, इन पाठों के माध्यम से लेखक उन्हीं परम्पाराओं को बच्चों पर थोपना चाहते हैं |  

- कमल 

Sunday, 12 June 2016

बराबर बंटवारा (कक्षा 2 - अध्‍याय 9) -भाग दो


बार बार घटा कर भाग करना




बराबर बंटवारे को बंटाधार करके ही लेखकगणों का मन नहीं भरा तो उन्‍होंने इसी पाठ में बार बार घटा कर बचे खुचे भाग को भी इस हड़बडी़ में निपटा दिया जैसे उनके पीछे गणित के भूत लगे हों। बराबर बांटने को समझाने में उन्‍होंने अपने हिसाब से तो पांच पन्‍ने लगाए थे। यह बात दूसरी है कि पहले दो पन्‍नों में उन्‍होंने बेचारे भाग को किताब में दाखिल होने जगह ही नहीं दी और बाकी तीन पन्‍नों में वे पूरी मेहनत करने के बावजूद बच्‍चों से भाग की प्रक्रिया करवा नहीं पाए। लेकिन इस सारी जद्दोजहद में लगी अच्‍छी खासी मेहनत से थक हार कर उन्‍होंने बार बार घटा कर भाग करने की अवधारणा को सिखाने का काम एक पन्‍ने में ही पूरा कर दिया। आखिर कब तक कोई लेखक, शिक्षक व बच्‍चे की बातचीत लिखता रहे और हर पन्‍ने पर चीजों को चित्रों में बार बार बंटवाने के बारे में सोचता रहे, खास तौर पर ऐसे लेखक जिन्‍हें खुद भी चीजों के चित्रों व बातचीत के जरिए भाग करना व सिखाना आता ही न हो।

सो बुरी तरह से थके हारे लेखकगणों ने पहला काम यह किया कि पहली बार झाड़ू फिराई और बच्‍चों को पन्‍ने से बाहर कर दिया। ना रहेगा बच्‍चा और ना ही बचेगा सिखाने की बांसुरी बजाने का कोई झंझट। हो सकता है कि उन्‍होंने सोचा हो कि जब सब हमें ही बताना है तो बच्‍चों को किताब के पन्‍ने पर दाखिल करने की क्‍या जरूरत। फिर दूसरी बार झाड़ू फिराई और चीजों के चित्रों को भी इस पन्‍ने से बाहर का रास्‍ता दिखा। तो अब इस पन्‍ने पर क्‍या बचा। अध्‍यापिका और सवाल। जिसको सीखना है वो किताब से बाहर ही रहे, काहे को मुंह उठाए किताब के अंदर को चला आता है, अपनी किताब समझी है क्‍या!  

अब अध्‍यापिका पन्‍ने की शुरूआत में पन्‍ने से बाहर निकाल दिए बच्‍चे से कहती है, ‘’आओ अब संख्‍याओं काा बंटवारा निम्‍न प्रकार से करते हैं।‘’ जैसे ही बच्‍चों को पन्‍ने से बाहर खदेड़ा, तो शिक्षिका की भाषा एकदम अमूर्त हो जाती है। वह अब चीजों को बांटने की बात नहीं करती, अब संख्‍याओं के बंटवारे की बात करने लगती है। यानी इस बात को पढ़ या सुन कर बच्‍चों के दिमाग में किसी किस्‍म की कोई भी तस्‍वीर बनने की रत्‍ती भर भी गुंजाइश नहीं बचती।

बच्‍चों के सामने पहली बार, बार-बार घटा कर किए जाने वाले भाग को सिखाने के लिए जिस भाषा में और जो सवाल चुना गया है वह इस बात का बेहतरीन नमूना है कि कैसा सवाल चुना जाए कि उसे सुन कर बच्‍चों को कड़क ठंड में भी पसीना चूने लगे । जरा देखिए, ‘’10 पुस्‍तकों को कितनी बार बराबर बांटें कि सभी को समान पुस्‍तकें प्राप्‍त हों ?’’ आप सर खुजाते रहिए कि इससे आप क्‍या समझे। इतना मत खुजा लीजिएगा कि सर से खून निकलने लग जाए ।

इस सवाल की बुनावट में दो तीन समस्‍याएं हैं जिन्‍हें मैं एक एक करके आपके सामने रखने की कोशिश करूंगा।

पहली समस्‍या यह है, कि इस सवाल में जो ‘’कितनी बार बराबर बांटे’’ वाक्‍यांश आया है उसका मतलब आसानी से समझ नहीं आता। भाग के दो अलग अलग अवधारणात्‍मक अर्थ होते हैं। एक में आप कुछ चीजों को कुछ लाेेगों में बराबर बांटते हैं और अंत में यह पता लगाते हैं कि हरेक को कितनी मिली। दूसरे अर्थ में आप कुछ कुछ चीजों में से एक ही संख्‍या में चीजें बार बार निकालते हैं और अंत में यह पता लगाते हैं कि कितने व्‍यक्‍तियों को मिलींं। कितनी बार बराबर बांटे वाला वाक्‍यांश दोनों अर्थेां को मिला कर इस पन्‍ने पर कुुछ ऐसा रायता फैलाते हैं कि आखिर तक लेखक गण भाग को समझाने में नाकाम ही रहते हैं।

दूसरा, कितनी बार बराबर बांटे वाले वाक्यांश के अटपटेपन को समझने का एक तरीका यह हो सकता है कि आप कुछ बच्‍चे लें व उनमें पुस्‍तकों को बांट कर देखें। जैसे,

1.       20 बच्‍चे लेकर उनमें 10 पुस्‍तकें बांट कर देखें तो उनमें से 10 में से हरेक को 1 मिली व बाकी 10 को कोई किताब नहीं मिली। इस तरीके में आपने किताबें एक बार बांटी।
2.       इसी तरह 19/18।17 से लेकर 11 बच्‍चों में पुस्‍तकों बांटेे तो नतीजा पहलेे बिंदु वाला ही आयेगा।
3.       फिर आपने 10 बच्‍चे लेकर उनमें 10 पुस्‍तकें बराबर बांट कर देखी तो हरेक को समान संख्‍या में एक-एक पुस्‍तक मिली।
4.       9 से लेकर 1 बच्‍चे को लेकर उनके बीच 10 पुस्‍तकें बांट कर देखी तो 9/8/7/6/4/3 बांटी तो बराबर नहीं बंटी।
5.       5 व 2 बच्‍चे लेकर 10 पुस्‍तकें बांटी तो उनमें में हरेक को समान संख्‍या में 2-2 और 5-5 पुस्‍तकें मिलीं।
6.       1 बच्‍चे को दी तो सारी पुस्‍तकें एक को ही देनी पड़ी बराबर बांटने की तो नौबत ही न आई। एक को ही सभी चीजें दे देने को क्‍या आप बांटना कहेंगे।

आप देख सकते हैं कि इस सवाल को शब्‍दश: समझ कर हल करने के लिए आपको 20 बार अलग अलग संख्‍या में बच्‍चों की कल्‍पना करके पुस्‍तकें बांटनी पड़ी। उससे मिलने वाले नतीजों को व्‍यवस्थित रूप से दर्ज करना पड़ा। अंत में आपने पाया कि उन में से तीन हालात ऐसे हैं जब बच्‍चों को बराबर संख्‍या में पुस्‍तकें मिलती है। लेकिन एक सवाल में आपको एक बार, एक में दो बार और एक में पांच बार देनी पड़ी। तो आपके पास कितनी बार के तीन जवाब हैं और तीनों ही सही हैं। क्‍या आप कक्षा दो में भाग की शुरूआत में इतना मुश्किल सवाल बच्‍चों से हल करने की उम्‍मीद रखते हैं जिसे हल करके दर्ज करने की हिम्‍मत व समझ के कोई सबूत लेखकों तक में नजर नहीं आते। आपने ध्‍यान दिया होगा कि इस सवाल को हल करना कितना पेचीदा व मुश्किल काम है। और वह भी तब जब आपने बच्‍चों को बराबर बांटना अच्‍छे से सिखाया हो और बच्‍चे उच्‍च प्राथमिक में हों। आपको याद होगा कि यही लेखक पाठ के पहले हिस्‍से में बराबर बांटने की क्रिया करवाने में पूरी मेहनत के बावजूद नाकाम ही रहे थे।

दूसरी समस्‍या यह है कि इस सवाल में दो चीजें अज्ञात हैं। पहली, ‘’कितनी बार’’ की संख्‍या और दूसरी, ‘’सभी’’ की संख्‍या। यानी भाग को सिखाना शुरू करने के वक्‍त बच्‍चों से दो अज्ञात राशियों वाला सवाल पूछा जा रहा है।

आपको याद आ रहा होगा कि अज्ञात राशियों वाले सवाल तो आम तौर पर कक्षा 6 में बीजगणित के आरंभ होने के भी बाद, कक्षा 6 में समीकरणों पर काम करते वक्‍त पूछे जाते हैं। लेकिन यहां पर लेखकों ने कक्षा 2 में भाग को सिखाने के शुरूआती सवाल को ही कक्षा 6 व 7 के स्‍तर के सवाल में तब्‍दील करने की महारत दिखा दी है। यानी कक्षा 6-7 के स्‍तर का सवाल कक्षा 2 के बच्‍चों को दिया जा रहा है।

तीसरी व सबसे प्रमुख समस्‍या यह है कि इस सवाल को पढ़ने से यह पता नहीं चलता कि दी गई पुस्‍तकों को बराबर कैसे बांटा जाएगा ? और उन 10 पुस्‍तकों को कितने लोगों में बांटा जाएगा ?

इसके बाद उपसवाल के तौर पर एक सवाल और दिया गया है, जिसे रंगीन व मोटे अक्षरों में दिए गए प्रमुख सवाल से अलग किया गया है, ‘’जब 2 पुस्‍तकें दें तब’’। इस उपसवाल को अलग से देने की वजह साफ नहीं है क्‍योंकि लेखकों ने एक बार ही शर्त लगा कर सवाल को आगे हल कर दिया है। आगे उन्‍होंने जब 2/3/4/6/7/8/9/10 पुस्‍तकें देकर इस तरह का कोई नया सवाल नहीं पूछा तो पहले वाक्‍य में ‘’जब .... ‘’ की शैली का इस्‍तेमाल करने की क्‍या जरूरत थी।

अब अगर आप इस प्रमख सवाल व उपसवाल को मिला कर समझने की कोशिश करें तो मुश्किल यह आती है कि प्रमुख सवाल को 10 पुस्‍तकों को कितनी बार बराबर बांटने की बात कर रहा है और उपसवाल जब 2 पुस्‍तकें दे तब क्‍या होगा, की बात कर रहा है। अभी भी यह बात तो एक महा गोपनीय रहस्‍य ही है कि ये 10 पुस्‍तकें किसको देनी है। वैसे आपका ध्‍यान इस बात पर भी गया ही होगा कि प्रमुख सवाल में एक ही बात को दो बार दोहरा कर और उलझा दिया गया है – ‘’बराबर बांटे’’ तथा ‘’समान पुस्‍तकें प्राप्‍त हों’’ बराबर बांटने का मतलब ही यही होता है कि सभी को समान संख्‍या में पुस्‍तकें बांटी जाए। प्रमुख सवाल में एक शर्त को दो बार कहने का कारण भी गोपनीय ही है।

जिस ‘’कितनी बार’’ वाले सवाल को गाढ़े नीले अक्षरों के लिख कर बच्‍चों का ध्‍यान खींचने की इतनी मशक्‍कत लेखकगणों ने की, उनकी कलम की स्‍याही तब सूख जाती है जब वे 10 में से 2 को पांच बार घटाते हैं। उस वक्‍त वे हर बार यह कहने/लिखने की जरूरत नहीं समझते कि इस 2 को पहली बार, दूसरी बार  . . . . . पांचवी बार घटाया। या 2 को एक एक करके कुल 5 बार घटाया। संभवत: उन्‍होंने नीली व काली स्‍याही की बचत करने के मकसद से सफेद स्‍याही में सफेद कागज पर लिखा हो, जिसे आपकी, मेरी और बच्‍चों की निगाहें देख न पाती हो। आखिर दिव्‍य दृष्‍टि हरेक के पास थोड़े ही होती है।

इतनी मुश्किल व पेंचदार भाषा में सवाल गढ़ने व देने के बाद लेखकगणों को इस बात का पक्‍का भरोसा हो गया कि बच्‍चे 10 में से 2 व 8 में से 2 आदि घटाने का सवाल भी करने के काबिल नहीं हैं सो उन्‍होंने 10 में से 2 को एक एक करके पांच बार घटाया और आखिर में शून्‍य हासिल कर लिया। अजीब लेखक हैं कक्षा 6-7 के स्‍तर का सवाल बच्‍चों के पढ़ या सुन कर समझने की उम्‍मीद रखते हैं और कक्षा एक के स्‍तर के घटाने के सवाल को बच्‍चों से हल करवाने से कन्‍नी काट जाते हैं और सवाल का जवाब बताना भी भूल जाते हैं।

इसी पन्‍ने पर दूसरा सवाल देते वक्‍त किसी लेखक को इलहाम हो जाता है कि कुछ गड़बड़ हो रही है तो वे प्रमुख सवाल व उपसवाल को मिला देते हैं इस उम्‍मीद में कि शायद इससे दो की जगह एक ही अज्ञात राशि हो जाए। वे दूसरा सवाल कुछ इस तरह से गढ़ देते हैं, ‘’इन्‍हीं 10 पुस्‍तकों को कितनी बार बांटें कि सभी को 5-5 पुस्‍तक प्राप्‍त हो ?’’ वैसे हो सकता है कि उन पर पेज पर जगह कम रह जाने का दबाव रहा हो जिसकी वजह से उन्‍होंने उपसवाल को प्रमुख सवाल में मिला दिया। लेकिन इसके बावजूद सवाल में दो चीजें तो अज्ञात रहती ही हैं, एक तो – ‘’सभी’’ व दूसरा ‘’कितनी बार’’

तभी शायद लेखक समूह में से किसी को याद आता है कि अरे पहला सवाल पूरा हल तो करके दिखा दिया लेकिन उसका जवाब को बताया ही नहीं। तो दूसरा सवाल लिखने के बाद अध्‍यापिका प्रगट होकर पहले सवाल का जवाब कुछ इस तरह से देती है, ‘’10 पुस्‍तकों को 5 बार बांटने से सभी को 2-2 पुस्‍तकें मिलती हैं। यानी लेखकों ने खाली स्‍थान भरने की तकनीक का इस्तेमाल करते हुए, अपनी तरफ से सवाल में कितनी की जगह पर 5 रखा और समान की जगह पर 2-2 रख दिया। बार बार आकर बोलने वाली अध्‍यापिका आपको पुस्‍तक में यह नहीं बताती कि उसने इन10 पुस्‍तकों को कैसे बांटा।

आपको अगर अब तक यह पता नहीं चला कि अज्ञात राशि ‘’सभी’’ की संख्‍या कितनी है तो यह लेखकों का कसूर नहीं, उन्‍होंने तो भरपूर मेहनत करके आपको समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब आप चाहें तो दोबारा इसी पन्‍ने को बारीकी से एक नहीं सौ बार पढ़ जाइए और अज्ञात ‘’सभी’’ का पता लगाइए। आखिर आपको खुद में और बच्‍चों में ऐसी चीजों को खोजने की काबिलियत का विकास करना है या नहीं जो वहां पर हो ही नहीं। 

पहले सवाल के हल की घोषणा करने के बाद लेखकगण दूसरे सवाल को हल करके रख देते हैं। यहां तक आते आते किसी लेखक को फिर से यह इलहाम हो जाता है कि यह अज्ञात ‘’सभी’’ बेवजह गले की फांस बन रहा है सो वे जवाब में से ‘’सभी’’ पर झाड़ू फेर देते हैं। अब आप जवाब को पढ़िए। वह भी कोई सवाल से कम थोड़े ही है ‘’10 पुस्‍तकों को 2 बार बांटने पर 5-5 पुस्‍तकें प्राप्‍त  होती है’’ दस को आप दो बार बांटिए और जवाब में सिर्फ 5-5 पुस्‍तकें प्राप्‍त कर दिखाइए। मैंने बांटा तब मुझे तो कई जवाब मिले। जिसने भाग की अवधारणा के परखच्‍चे उड़ा दिए। जैसे,

1.   एक  को 1 व दूसरे को 9 मिली।
2.   एक को 2 व दूसरे को 7 व तीसरे को 1 मिली।
3.   एक को 2 व दूसरे को 4 व तीसरे को 3 व चौथे को 1 मिली।
4.   ...............
5.   इसी तरह पुस्‍तकें बांटने पर अलग अलग लोगों को अलग अलग संख्‍या में पुस्‍तकें मिली।

ऐसा इसलिए हो गया क्‍योंकि लेखकों ने सवाल में बराबर बांटने के लिए कब कहा था, उन्‍होंने तो सिर्फ कितनी बार बांटने को कहा था, सो बांटने का नतीजा ऊपर दिए तरीके से निकल आया।

मेरा अनुमान यह है कि लेखकगणों को, भाग की अवधारणा, न तो जब वे बचपन में किसी स्‍कूल में पढ़ते थे, तब समझ में आई, और ना ही खुद बड़े होने के बाद बच्‍चों को पढ़ाते वक्‍त समझ में आई, अगर वे कहीं पढ़ाते हैं तो। इन पुस्‍तकों में वैदिक गणित के नाम से कुछ गणना की तरकीबें वाले पाठ लिख कर जोड़ने की भरपूर मशक्‍कत के बावजूद उनकी खुद की भाग की अवधारणा की समझ में कोई फर्क पड़ा़ हो, ऐसा भी नजर नहीं आता।

असल में भाग की अवधारणा को दो तरह से समझा जाता है। एक तरीका होता है, बराबर बांटना व दूसरा तरीका होता है, बार बार घटाना।

बराबर बांटने में कुछ चीजों को कुछ व्‍यक्‍तियों में बांट कर यह पूछा जाता है कि हरेक को कितने मिले जैसे, 12 गेंदे 3 बच्‍चों में बराबर बांटी तो हरेक को कितनी कितनी गेंद मिली?  इस तरह के सवाल में दो चीजें हमें पता होती हैं, जैसे, कुल गेंदें तथा बच्‍चों की संख्‍या। करना क्‍या है, यह सवाल में दिया होता है कि बराबर बांटना है। तो बराबर बांट कर यह पता लगाना होता है कि हरेक को कितनी कितनी मिलेगी। इसे करने का तरीका यह होता है कि हरेक को बारी बारी से एक एक गेंद तब तक दी जाए जब तक कुल गेंदे खत्‍म ना हो जाए। फिर देखा जाए कि सबको बराबर बराबर मिली है या नहीं। अंत में हरेक को मिली गेंद की संख्‍या गिन कर जवाब का पता लगा लिया जाए। आपने ध्‍यान दिया होगा कि इसमें एक ही राशि अज्ञात है, जिसका पता लगाने के लिए कौनसी क्रिया करनी है इसका संकेत सवाल में मौजूद रहता है।

बार बार बांटने में कुछ चीजों में से बराबर मात्रा में चीजें एक एक व्‍यक्‍ति को देकर यह पूछा जाता है कि कुल कितने व्‍यक्‍ति को बराबर चीजें मिलीं। जैसे, आपके पास 12 गेंदें हैं आप एक बच्‍चे को 3 गेंदें देना चाहते हैं तो आप कितने बच्‍चों को दे सकते हैं ? 12 गेंदों में से एक बच्‍चे को 3 गेंदे दें तो कितने बच्‍चों को 3-3 गेंदें मिलेंगी ? इसमें बराबर मात्रा में दी जाने वाली गेंदों की संख्‍या पहले से तय है व सवाल में दी गई है आपको सिर्फ यह पता लगाना है कि वे कितने बच्‍चों को मिल सकती हैं। यानी बार बार घटा कर भाग करते वक्‍त आपको बराबर मात्रा का पता नहीं लगाना होता बल्कि उस मात्रा को पाने वाले व्‍यक्‍तियों की संख्‍या का पता लगाना होता है जो कि अज्ञात होता है।

एक अध्‍यापक को भाग की अवधारणा नहीं आती हो तो वह सिर्फ एक स्‍कूल के बच्‍चों को भाग सिखाने में नाकाम रह सकता है। लेकिन अगर एक राज्‍य की किताबों में भाग की अवधारणा का ठीक से नहीं दिया गया हो तो पूरे राज्‍य के दलितों, गरीबों, अल्‍पसंख्‍यकोंं के बच्‍चों व खास तौेर पर लड़कियों को गणित की एक जरूरी अवधारणा को सिखाने में नाकाम रहने का खतरा सामने खड़ा हो जाता है। आज हम इसी खतरे से दो चार हो रहे हैं। 

रवि कांत

राजस्थान के निवासियों के लिए,पानी की कमी से जूझना, बहुत अधिक चुनौतिभरा काम रहा है | चाहे गाँव हो या शहर, यहाँ के निवासियों ने इस चुनौती के कई रचनातमक हल खोजे हैं व रचे भी हैं | पर यहाँ की सवर्ण जातियों के अधिकतर लोगों ने बड़ी बेशर्मी के साथ, पानी पर अपना कब्जा ही नहीं जमाया बल्कि गरीब,मेहनतकश लोगों को अपने कब्जे के पानी को छूने भी नहीं दिया है | ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जब हैंडपम्प से पानी पी लेने पर बच्चों तक को पीट-पीट कर घायल कर दिया गया है | नई पाठ्य-पुस्तकें इस मुद्दे को नजरअंदाज कर देती है और पाठों से बाहर कर देती है |

'पर्यावरण अध्ययन' के लिए, एक और महत्वपूर्ण घटक है-'अनमोल जल'|कक्षा तीन की पाठ्य-पुस्तकों में, एन.सी..आर.टी.की पुस्तक में इस घटक से जुड़े तीन पाठ हैं | एस.आई..आर.टी.की पिछले वर्ष चल रही किताब में दो पाठ और इस वर्ष के लिए बनाई गई, नई पुस्तक में भी दो पाठ है |
  1. एन.सी.ई.आर.टी.कक्षा तीन की पुस्तक के तीनों पाठों में, विभिन्न प्रकार की गतिविधियों, रिफ्लेक्ट करने के लिए दिए गए प्रश्नों, चित्रों,आदि के माध्यम से बच्चों को पानी के सही इस्तेमाल के प्रति  सचेत किया गाया है | ‘क्या ऐसे भी कुछ लोग हैं, जिन्हें वहां से पानी नहीं भरने दिया जाता ?’ इस प्रकार के प्रश्नों के माध्यम से अध्यापकों को यह कहा गया है कि वें इस प्रश्न के माध्यम से बच्चों के बीच चर्चा आयोजित करें ताकि भेदभाव जैसे विषयों के प्रति बच्चों की संवेदनशीलता बढे |
  2. पिछले वर्ष चल रही एस.आई.ई.आर.टी की पुस्तक में भी एन.सी.ई.आर.टी.के तरीकों के जैसे ही प्रयास किए गए हैं | इन दो पाठों में भी बच्चों को पानी व पानी से जुड़े भेदभाव वाले मुद्दे पर भी बच्चों में  संवेदनशीलता बढाने के प्रयास किए गए हैं |
  3. एस.आई.ई.आर.टी.की नई पुस्तक में जानकारियों व उपदेशों के माध्यम से बच्चों को पानी के सही उपयोग के प्रति तो संवेदनशील बनाने की कोशिश की गई है पर भेदभाव वाले मुद्दे पर यह पुस्तक चुप रहती है |
यह समझ नहीं आता कि नई पुस्तक के लेखकों ने क्यों इस मुद्दे को बाहर निकाल दिया है ? क्या वे नहीं चाहते कि इस मुद्दे पर बच्चे संवेदनशील हों ? या वे इस तरह के भेदभावों को बनाएं रखना चाहते हैं ?  
- कमल