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Thursday, 16 June 2016

घटानेे काेे घटा देना (कक्षा 2 - पाठ 7)

अगर आप हर साल के सर्वे में यह सुनते हैं कि बच्‍चे गणित में कमजोर हैं, उनहें गणित की बुनियादी संक्रियाएं ठीक से करना नहीं आता तो इसमें हैरान होने की कोई बात होनी नहीं चाहिए। क्‍योंकि उनके लिए किताबें बनाने वालों को भी गणित ठीक से नहीं आती। अब जिसे खुद गणित ठीक से नहीं आती वह दूसरों को गणित सिखाने की किताब कैसी लिखेगा, घटाना सिखाने का एक और तरीका इस बात का ज्‍वलंत उदाहरण है। इस पन्‍ने पर दिए गए घटाने के तरीके की कुछ समस्‍याएं इस तरह से हैं –

1.      चित्र में इकाई व दहाई में कोई फर्क नहीं दिखता। एक इकाई के लिए भी भी एक डंडी और एक दहाई के लिए भी एक डंडी। चित्र देख कर बच्‍चे इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि इकाई व दहाई में बराबर मात्रा होती है। यानी एक इकाई बराबर एक दहाई।
2.      यह चित्र इकाई व दहाई के फर्क व दोनों के संबंधों को बच्‍चों के सामने दर्शाने से परहेज करता है। वह संबंध यह है, कि दहाई, इकाई का दस गुना होता है और एक दहाई में दस इकाइयां होती है। दहाई की इकाई, दस इकाइयों को मिलाने से बनती है। इस संबंध को दर्शाने के लिए इकाई के लिए एक डंडी तथा दहाई को दर्शाने के लिए दस डंडी का गट्ठर बनाना जरूरी होता है। लेखक इस संबंध को बच्‍चों की नजर से क्‍यों छुपाना चााहते हैं, यह बात समझ से परे है।
3.      औपचारिक घटाने को समझने के लिहाज से किया गया दृश्‍यीकरण नाकाफी व आधा अधूरा है। इसमें मोटे तौर पर तीन समस्‍याएं हैं।
a.       पहली, चित्र में संख्‍याओं को ठीक से दर्शाया नहीं गया। जैसे 27 के सामने 2 व 7 डंडियां बनी है। यानी आप डंडियों को देख कर 27 का मतलब अपने मन में नहीं गढ़ सकते। इसके लिए जिस स्‍तर का अमूर्तीकरण आपको करना पड़ेगा व जिस तरह की भाषा इस्‍तेमाल करनी पड़ेगी वह कक्षा दो के बच्‍चे के लिए मुमकिन नहीं है। उसके लिए आसान है 2 व 7 को गिन कर 9 बता देना। यानी यह चित्र 27 को 9 में बदल देता हैै।
b.      दूसरी, दोनों संख्‍याओं के लिए अलग अलग चित्र नजर नहीं आते। यानी संख्‍या 15 को चित्रों में अलग से दर्शाया ही नहीं गया है। आप इस संख्‍या को चित्र में खोजने जाएंगे तो आपको विकट प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। आप अगर डंडियों के चित्रों में 15 को तलाशेंगे तो आपको 1 व 5 डंडी मिला कर छह डंडियां मिल जाएगा। उस 1 व 5 को 15 में बदलने के लिए फिर से जिस स्‍तर का अमूर्तीकरण व भाषा व समझ चाहिए वह कक्षा 2 के बच्‍चों के पास होनी मुमकिन नहीं है।
c.       तीसरी, इस दृश्‍यीकरण की सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि आप अनौपचारिक घटाना चीजों को निकाल कर या काट कर समझ सकते हैं लेकिन औपचारिक घटाने को समझने के लिए आपको दो संख्‍याओं की तुलना करके यह दिखलाना पड़ता है कि एक संख्‍या, दूसरी संख्‍या कितनी ज्‍यादा या कितनी कम है। लेखक गण, तुलना करके घटाना की अवधारणा से अनभिज्ञ जान पड़ते हैं।
4.       गणितीय प्रक्रियाओं को भाषा में ठीक से व्‍यक्‍त करना गणितीय संप्रेषण को बेहतर करने में मदद करता है। सवाल को समझाने के लिए लिखी गई भाषा मोटे तौर पर निरर्थक ढंग से गणनविधि का वर्णन करती है और निकाल कर घटाने का तर्क काम मे लेती है। वर्णन करते वक्‍त वह इकाई दहाई का फर्क भी झाड़ू मार कर साफ कर देती है और सिर्फ अंकों को ही घटाती है। यानी आप पढ़ कर यह समझ सकते हैं कि घटाते वक्‍त आपको सिर्फ अंकों को काटना पीटना है। इससे संख्‍या की मात्रा की कोई कल्‍पना इस वर्णन को पढ़ या सुन कर बच्‍चे के दिमाग में नहीं बनेगी। यह बात आगे हासिल के घटाव सिखाने में भी मुश्किल पैदा करेगी। आप एक ही आकार की दहाई व इकाई की डंडी से दस इकाइयां बाहर निकाल कर कैसे दिखाएंगे।
5.      आखिरी बात यह है कि प्रस्‍तुतीकरण में अंकों में लिखा सवाल भाषा में लिखी घटाने की प्रक्रिया से कटा हुआ है। भाषा में घटाने का वर्णन करते वक्‍त न तो लेखक यह बताते हैं कि सवाल क्‍या है, किस संख्‍या में से किसको घटाना है और अंत में कौनसी संख्‍या मिलती है। शब्‍दों में लिखे गए विवरण को पढ़ कर कहीं से भी यह पता नहीं चलता कि 27 में से 15 घटाने पर शेषफल 12 बचते हैं।

मुझे नहीं पता कि आपका ध्‍यान इस बात पर गया या नहीं कि लेखकों ने बीड़ा तो दो अंकीय घटाना सिखाने का उठाया था लेकिन सिखाते वक्‍त उन्‍होंने सिर्फ और सिर्फ एक अंकीय घटाना ही सिखाया है। इसलिए वे सिर्फ शुरूआत व आखिर में हल किया गया दो अंकीय सवाल लिख भर देते हैं लेकिन सिखाने की जमीन तोड़  कोशिश में कभी भी, कहीं भी, किसी भी तरह भूल कर भी दो अंकीय घटाने का कोई जिक्र करने से कोसों दूर ही रहते हैं। 

रवि कांत

Sunday, 12 June 2016

बराबर बंटवारा (कक्षा 2 - अध्‍याय 9) -भाग दो


बार बार घटा कर भाग करना




बराबर बंटवारे को बंटाधार करके ही लेखकगणों का मन नहीं भरा तो उन्‍होंने इसी पाठ में बार बार घटा कर बचे खुचे भाग को भी इस हड़बडी़ में निपटा दिया जैसे उनके पीछे गणित के भूत लगे हों। बराबर बांटने को समझाने में उन्‍होंने अपने हिसाब से तो पांच पन्‍ने लगाए थे। यह बात दूसरी है कि पहले दो पन्‍नों में उन्‍होंने बेचारे भाग को किताब में दाखिल होने जगह ही नहीं दी और बाकी तीन पन्‍नों में वे पूरी मेहनत करने के बावजूद बच्‍चों से भाग की प्रक्रिया करवा नहीं पाए। लेकिन इस सारी जद्दोजहद में लगी अच्‍छी खासी मेहनत से थक हार कर उन्‍होंने बार बार घटा कर भाग करने की अवधारणा को सिखाने का काम एक पन्‍ने में ही पूरा कर दिया। आखिर कब तक कोई लेखक, शिक्षक व बच्‍चे की बातचीत लिखता रहे और हर पन्‍ने पर चीजों को चित्रों में बार बार बंटवाने के बारे में सोचता रहे, खास तौर पर ऐसे लेखक जिन्‍हें खुद भी चीजों के चित्रों व बातचीत के जरिए भाग करना व सिखाना आता ही न हो।

सो बुरी तरह से थके हारे लेखकगणों ने पहला काम यह किया कि पहली बार झाड़ू फिराई और बच्‍चों को पन्‍ने से बाहर कर दिया। ना रहेगा बच्‍चा और ना ही बचेगा सिखाने की बांसुरी बजाने का कोई झंझट। हो सकता है कि उन्‍होंने सोचा हो कि जब सब हमें ही बताना है तो बच्‍चों को किताब के पन्‍ने पर दाखिल करने की क्‍या जरूरत। फिर दूसरी बार झाड़ू फिराई और चीजों के चित्रों को भी इस पन्‍ने से बाहर का रास्‍ता दिखा। तो अब इस पन्‍ने पर क्‍या बचा। अध्‍यापिका और सवाल। जिसको सीखना है वो किताब से बाहर ही रहे, काहे को मुंह उठाए किताब के अंदर को चला आता है, अपनी किताब समझी है क्‍या!  

अब अध्‍यापिका पन्‍ने की शुरूआत में पन्‍ने से बाहर निकाल दिए बच्‍चे से कहती है, ‘’आओ अब संख्‍याओं काा बंटवारा निम्‍न प्रकार से करते हैं।‘’ जैसे ही बच्‍चों को पन्‍ने से बाहर खदेड़ा, तो शिक्षिका की भाषा एकदम अमूर्त हो जाती है। वह अब चीजों को बांटने की बात नहीं करती, अब संख्‍याओं के बंटवारे की बात करने लगती है। यानी इस बात को पढ़ या सुन कर बच्‍चों के दिमाग में किसी किस्‍म की कोई भी तस्‍वीर बनने की रत्‍ती भर भी गुंजाइश नहीं बचती।

बच्‍चों के सामने पहली बार, बार-बार घटा कर किए जाने वाले भाग को सिखाने के लिए जिस भाषा में और जो सवाल चुना गया है वह इस बात का बेहतरीन नमूना है कि कैसा सवाल चुना जाए कि उसे सुन कर बच्‍चों को कड़क ठंड में भी पसीना चूने लगे । जरा देखिए, ‘’10 पुस्‍तकों को कितनी बार बराबर बांटें कि सभी को समान पुस्‍तकें प्राप्‍त हों ?’’ आप सर खुजाते रहिए कि इससे आप क्‍या समझे। इतना मत खुजा लीजिएगा कि सर से खून निकलने लग जाए ।

इस सवाल की बुनावट में दो तीन समस्‍याएं हैं जिन्‍हें मैं एक एक करके आपके सामने रखने की कोशिश करूंगा।

पहली समस्‍या यह है, कि इस सवाल में जो ‘’कितनी बार बराबर बांटे’’ वाक्‍यांश आया है उसका मतलब आसानी से समझ नहीं आता। भाग के दो अलग अलग अवधारणात्‍मक अर्थ होते हैं। एक में आप कुछ चीजों को कुछ लाेेगों में बराबर बांटते हैं और अंत में यह पता लगाते हैं कि हरेक को कितनी मिली। दूसरे अर्थ में आप कुछ कुछ चीजों में से एक ही संख्‍या में चीजें बार बार निकालते हैं और अंत में यह पता लगाते हैं कि कितने व्‍यक्‍तियों को मिलींं। कितनी बार बराबर बांटे वाला वाक्‍यांश दोनों अर्थेां को मिला कर इस पन्‍ने पर कुुछ ऐसा रायता फैलाते हैं कि आखिर तक लेखक गण भाग को समझाने में नाकाम ही रहते हैं।

दूसरा, ‘कितनी बार बराबर बांटे’ वाले वाक्यांश के अटपटेपन को समझने का एक तरीका यह हो सकता है कि आप कुछ बच्‍चे लें व उनमें पुस्‍तकों को बांट कर देखें। जैसे,

1.       20 बच्‍चे लेकर उनमें 10 पुस्‍तकें बांट कर देखें तो उनमें से 10 में से हरेक को 1 मिली व बाकी 10 को कोई किताब नहीं मिली। इस तरीके में आपने किताबें एक बार बांटी।
2.       इसी तरह 19/18।17 से लेकर 11 बच्‍चों में पुस्‍तकों बांटेे तो नतीजा पहलेे बिंदु वाला ही आयेगा।
3.       फिर आपने 10 बच्‍चे लेकर उनमें 10 पुस्‍तकें बराबर बांट कर देखी तो हरेक को समान संख्‍या में एक-एक पुस्‍तक मिली।
4.       9 से लेकर 1 बच्‍चे को लेकर उनके बीच 10 पुस्‍तकें बांट कर देखी तो 9/8/7/6/4/3 बांटी तो बराबर नहीं बंटी।
5.       5 व 2 बच्‍चे लेकर 10 पुस्‍तकें बांटी तो उनमें में हरेक को समान संख्‍या में 2-2 और 5-5 पुस्‍तकें मिलीं।
6.       1 बच्‍चे को दी तो सारी पुस्‍तकें एक को ही देनी पड़ी बराबर बांटने की तो नौबत ही न आई। एक को ही सभी चीजें दे देने को क्‍या आप बांटना कहेंगे।

आप देख सकते हैं कि इस सवाल को शब्‍दश: समझ कर हल करने के लिए आपको 20 बार अलग अलग संख्‍या में बच्‍चों की कल्‍पना करके पुस्‍तकें बांटनी पड़ी। उससे मिलने वाले नतीजों को व्‍यवस्थित रूप से दर्ज करना पड़ा। अंत में आपने पाया कि उन में से तीन हालात ऐसे हैं जब बच्‍चों को बराबर संख्‍या में पुस्‍तकें मिलती है। लेकिन एक सवाल में आपको एक बार, एक में दो बार और एक में पांच बार देनी पड़ी। तो आपके पास कितनी बार के तीन जवाब हैं और तीनों ही सही हैं। क्‍या आप कक्षा दो में भाग की शुरूआत में इतना मुश्किल सवाल बच्‍चों से हल करने की उम्‍मीद रखते हैं जिसे हल करके दर्ज करने की हिम्‍मत व समझ के कोई सबूत लेखकों तक में नजर नहीं आते। आपने ध्‍यान दिया होगा कि इस सवाल को हल करना कितना पेचीदा व मुश्किल काम है। और वह भी तब जब आपने बच्‍चों को बराबर बांटना अच्‍छे से सिखाया हो और बच्‍चे उच्‍च प्राथमिक में हों। आपको याद होगा कि यही लेखक पाठ के पहले हिस्‍से में बराबर बांटने की क्रिया करवाने में पूरी मेहनत के बावजूद नाकाम ही रहे थे।

दूसरी समस्‍या यह है कि इस सवाल में दो चीजें अज्ञात हैं। पहली, ‘’कितनी बार’’ की संख्‍या और दूसरी, ‘’सभी’’ की संख्‍या। यानी भाग को सिखाना शुरू करने के वक्‍त बच्‍चों से दो अज्ञात राशियों वाला सवाल पूछा जा रहा है।

आपको याद आ रहा होगा कि अज्ञात राशियों वाले सवाल तो आम तौर पर कक्षा 6 में बीजगणित के आरंभ होने के भी बाद, कक्षा 6 में समीकरणों पर काम करते वक्‍त पूछे जाते हैं। लेकिन यहां पर लेखकों ने कक्षा 2 में भाग को सिखाने के शुरूआती सवाल को ही कक्षा 6 व 7 के स्‍तर के सवाल में तब्‍दील करने की महारत दिखा दी है। यानी कक्षा 6-7 के स्‍तर का सवाल कक्षा 2 के बच्‍चों को दिया जा रहा है।

तीसरी व सबसे प्रमुख समस्‍या यह है कि इस सवाल को पढ़ने से यह पता नहीं चलता कि दी गई पुस्‍तकों को बराबर कैसे बांटा जाएगा ? और उन 10 पुस्‍तकों को कितने लोगों में बांटा जाएगा ?

इसके बाद उपसवाल के तौर पर एक सवाल और दिया गया है, जिसे रंगीन व मोटे अक्षरों में दिए गए प्रमुख सवाल से अलग किया गया है, ‘’जब 2 पुस्‍तकें दें तब’’। इस उपसवाल को अलग से देने की वजह साफ नहीं है क्‍योंकि लेखकों ने एक बार ही शर्त लगा कर सवाल को आगे हल कर दिया है। आगे उन्‍होंने जब 2/3/4/6/7/8/9/10 पुस्‍तकें देकर इस तरह का कोई नया सवाल नहीं पूछा तो पहले वाक्‍य में ‘’जब .... ‘’ की शैली का इस्‍तेमाल करने की क्‍या जरूरत थी।

अब अगर आप इस प्रमख सवाल व उपसवाल को मिला कर समझने की कोशिश करें तो मुश्किल यह आती है कि प्रमुख सवाल को 10 पुस्‍तकों को ‘कितनी बार बराबर बांटने’ की बात कर रहा है और उपसवाल जब 2 पुस्‍तकें दे तब क्‍या होगा, की बात कर रहा है। अभी भी यह बात तो एक महा गोपनीय रहस्‍य ही है कि ये 10 पुस्‍तकें किसको देनी है। वैसे आपका ध्‍यान इस बात पर भी गया ही होगा कि प्रमुख सवाल में एक ही बात को दो बार दोहरा कर और उलझा दिया गया है – ‘’बराबर बांटे’’ तथा ‘’समान पुस्‍तकें प्राप्‍त हों’’।  बराबर बांटने का मतलब ही यही होता है कि सभी को समान संख्‍या में पुस्‍तकें बांटी जाए। प्रमुख सवाल में एक शर्त को दो बार कहने का कारण भी गोपनीय ही है।

जिस ‘’कितनी बार’’ वाले सवाल को गाढ़े नीले अक्षरों के लिख कर बच्‍चों का ध्‍यान खींचने की इतनी मशक्‍कत लेखकगणों ने की, उनकी कलम की स्‍याही तब सूख जाती है जब वे 10 में से 2 को पांच बार घटाते हैं। उस वक्‍त वे हर बार यह कहने/लिखने की जरूरत नहीं समझते कि इस 2 को पहली बार, दूसरी बार  . . . . . पांचवी बार घटाया। या 2 को एक एक करके कुल 5 बार घटाया। संभवत: उन्‍होंने नीली व काली स्‍याही की बचत करने के मकसद से सफेद स्‍याही में सफेद कागज पर लिखा हो, जिसे आपकी, मेरी और बच्‍चों की निगाहें देख न पाती हो। आखिर दिव्‍य दृष्‍टि हरेक के पास थोड़े ही होती है।

इतनी मुश्किल व पेंचदार भाषा में सवाल गढ़ने व देने के बाद लेखकगणों को इस बात का पक्‍का भरोसा हो गया कि बच्‍चे 10 में से 2 व 8 में से 2 आदि घटाने का सवाल भी करने के काबिल नहीं हैं सो उन्‍होंने 10 में से 2 को एक एक करके पांच बार घटाया और आखिर में शून्‍य हासिल कर लिया। अजीब लेखक हैं कक्षा 6-7 के स्‍तर का सवाल बच्‍चों के पढ़ या सुन कर समझने की उम्‍मीद रखते हैं और कक्षा एक के स्‍तर के घटाने के सवाल को बच्‍चों से हल करवाने से कन्‍नी काट जाते हैं और सवाल का जवाब बताना भी भूल जाते हैं।

इसी पन्‍ने पर दूसरा सवाल देते वक्‍त किसी लेखक को इलहाम हो जाता है कि कुछ गड़बड़ हो रही है तो वे प्रमुख सवाल व उपसवाल को मिला देते हैं इस उम्‍मीद में कि शायद इससे दो की जगह एक ही अज्ञात राशि हो जाए। वे दूसरा सवाल कुछ इस तरह से गढ़ देते हैं, ‘’इन्‍हीं 10 पुस्‍तकों को कितनी बार बांटें कि सभी को 5-5 पुस्‍तक प्राप्‍त हो ?’’ वैसे हो सकता है कि उन पर पेज पर जगह कम रह जाने का दबाव रहा हो जिसकी वजह से उन्‍होंने उपसवाल को प्रमुख सवाल में मिला दिया। लेकिन इसके बावजूद सवाल में दो चीजें तो अज्ञात रहती ही हैं, एक तो – ‘’सभी’’ व दूसरा ‘’कितनी बार’’।

तभी शायद लेखक समूह में से किसी को याद आता है कि अरे पहला सवाल पूरा हल तो करके दिखा दिया लेकिन उसका जवाब को बताया ही नहीं। तो दूसरा सवाल लिखने के बाद अध्‍यापिका प्रगट होकर पहले सवाल का जवाब कुछ इस तरह से देती है, ‘’10 पुस्‍तकों को 5 बार बांटने से सभी को 2-2 पुस्‍तकें मिलती हैं। यानी लेखकों ने खाली स्‍थान भरने की तकनीक का इस्तेमाल करते हुए, अपनी तरफ से सवाल में ‘कितनी’ की जगह पर 5 रखा और ‘समान’ की जगह पर 2-2 रख दिया। बार बार आकर बोलने वाली अध्‍यापिका आपको पुस्‍तक में यह नहीं बताती कि उसने इन10 पुस्‍तकों को कैसे बांटा।

आपको अगर अब तक यह पता नहीं चला कि अज्ञात राशि ‘’सभी’’ की संख्‍या कितनी है तो यह लेखकों का कसूर नहीं, उन्‍होंने तो भरपूर मेहनत करके आपको समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब आप चाहें तो दोबारा इसी पन्‍ने को बारीकी से एक नहीं सौ बार पढ़ जाइए और अज्ञात ‘’सभी’’ का पता लगाइए। आखिर आपको खुद में और बच्‍चों में ऐसी चीजों को खोजने की काबिलियत का विकास करना है या नहीं जो वहां पर हो ही नहीं। 

पहले सवाल के हल की घोषणा करने के बाद लेखकगण दूसरे सवाल को हल करके रख देते हैं। यहां तक आते आते किसी लेखक को फिर से यह इलहाम हो जाता है कि यह अज्ञात ‘’सभी’’ बेवजह गले की फांस बन रहा है सो वे जवाब में से ‘’सभी’’ पर झाड़ू फेर देते हैं। अब आप जवाब को पढ़िए। वह भी कोई सवाल से कम थोड़े ही है – ‘’10 पुस्‍तकों को 2 बार बांटने पर 5-5 पुस्‍तकें प्राप्‍त  होती है’’ दस को आप दो बार बांटिए और जवाब में सिर्फ 5-5 पुस्‍तकें प्राप्‍त कर दिखाइए। मैंने बांटा तब मुझे तो कई जवाब मिले। जिसने भाग की अवधारणा के परखच्‍चे उड़ा दिए। जैसे,

1.   एक  को 1 व दूसरे को 9 मिली।
2.   एक को 2 व दूसरे को 7 व तीसरे को 1 मिली।
3.   एक को 2 व दूसरे को 4 व तीसरे को 3 व चौथे को 1 मिली।
4.   ...............
5.   इसी तरह पुस्‍तकें बांटने पर अलग अलग लोगों को अलग अलग संख्‍या में पुस्‍तकें मिली।

ऐसा इसलिए हो गया क्‍योंकि लेखकों ने सवाल में बराबर बांटने के लिए कब कहा था, उन्‍होंने तो सिर्फ कितनी बार बांटने को कहा था, सो बांटने का नतीजा ऊपर दिए तरीके से निकल आया।

मेरा अनुमान यह है कि लेखकगणों को, भाग की अवधारणा, न तो जब वे बचपन में किसी स्‍कूल में पढ़ते थे, तब समझ में आई, और ना ही खुद बड़े होने के बाद बच्‍चों को पढ़ाते वक्‍त समझ में आई, अगर वे कहीं पढ़ाते हैं तो। इन पुस्‍तकों में वैदिक गणित के नाम से कुछ गणना की तरकीबें वाले पाठ लिख कर जोड़ने की भरपूर मशक्‍कत के बावजूद उनकी खुद की भाग की अवधारणा की समझ में कोई फर्क पड़ा़ हो, ऐसा भी नजर नहीं आता।

असल में भाग की अवधारणा को दो तरह से समझा जाता है। एक तरीका होता है, बराबर बांटना व दूसरा तरीका होता है, बार बार घटाना।

बराबर बांटने में कुछ चीजों को कुछ व्‍यक्‍तियों में बांट कर यह पूछा जाता है कि हरेक को कितने मिले ?  जैसे, 12 गेंदे 3 बच्‍चों में बराबर बांटी तो हरेक को कितनी कितनी गेंद मिली?  इस तरह के सवाल में दो चीजें हमें पता होती हैं, जैसे, कुल गेंदें तथा बच्‍चों की संख्‍या। करना क्‍या है, यह सवाल में दिया होता है कि बराबर बांटना है। तो बराबर बांट कर यह पता लगाना होता है कि हरेक को कितनी कितनी मिलेगी। इसे करने का तरीका यह होता है कि हरेक को बारी बारी से एक एक गेंद तब तक दी जाए जब तक कुल गेंदे खत्‍म ना हो जाए। फिर देखा जाए कि सबको बराबर बराबर मिली है या नहीं। अंत में हरेक को मिली गेंद की संख्‍या गिन कर जवाब का पता लगा लिया जाए। आपने ध्‍यान दिया होगा कि इसमें एक ही राशि अज्ञात है, जिसका पता लगाने के लिए कौनसी क्रिया करनी है इसका संकेत सवाल में मौजूद रहता है।

बार बार बांटने में कुछ चीजों में से बराबर मात्रा में चीजें एक एक व्‍यक्‍ति को देकर यह पूछा जाता है कि कुल कितने व्‍यक्‍ति को बराबर चीजें मिलीं। जैसे, आपके पास 12 गेंदें हैं आप एक बच्‍चे को 3 गेंदें देना चाहते हैं तो आप कितने बच्‍चों को दे सकते हैं ? 12 गेंदों में से एक बच्‍चे को 3 गेंदे दें तो कितने बच्‍चों को 3-3 गेंदें मिलेंगी ? इसमें बराबर मात्रा में दी जाने वाली गेंदों की संख्‍या पहले से तय है व सवाल में दी गई है आपको सिर्फ यह पता लगाना है कि वे कितने बच्‍चों को मिल सकती हैं। यानी बार बार घटा कर भाग करते वक्‍त आपको बराबर मात्रा का पता नहीं लगाना होता बल्कि उस मात्रा को पाने वाले व्‍यक्‍तियों की संख्‍या का पता लगाना होता है जो कि अज्ञात होता है।

एक अध्‍यापक को भाग की अवधारणा नहीं आती हो तो वह सिर्फ एक स्‍कूल के बच्‍चों को भाग सिखाने में नाकाम रह सकता है। लेकिन अगर एक राज्‍य की किताबों में भाग की अवधारणा का ठीक से नहीं दिया गया हो तो पूरे राज्‍य के दलितों, गरीबों, अल्‍पसंख्‍यकोंं के बच्‍चों व खास तौेर पर लड़कियों को गणित की एक जरूरी अवधारणा को सिखाने में नाकाम रहने का खतरा सामने खड़ा हो जाता है। आज हम इसी खतरे से दो चार हो रहे हैं। 

रवि कांत

Tuesday, 7 June 2016

बराबर बंटवारा (कक्षा 2 - अध्‍याय 9)

जितनी बार आप नई किताबों को देखते हैं उतनी ही बार आप अपने सर के बालों को नोच सकते हैं, खतरा सिर्फ इतना है कि आपकी खोपड़ी गंजी हो जाएगी लेकिन इन किताबों में गलतियां खत्‍म होने का नाम न लेंगी। इसलिए बेहतर है इन किताबों को पढ़ते वक्‍त अपने हाथों को खुद के सिर से दो हाथ दूर ही रखें।


कक्षा 2 में 9 पन्‍नों का पाठ बराबर बंटवारा के नाम से बनाया गया है। लेखकगणों ने इस नाम का संधि विच्‍छेद किया और पाठ के पन्‍नों का गैर बराबर बंटवारा करके पहले दो पन्‍ने बराबर की अवधारणा के अभ्‍यास में होम कर दिए। यह बात ठीक है कि बराबर की अवधारणा पर काम किया जाना जरूरी है लेकिन वह काम तो जोड़ घटाव तथा गुणा से पहले कर लिया जाना चाहिए। उस काम को इतनी देर बाद करने का कोई तुक नहीं बनती। और फिर भाग के संदर्भ में बराबर का इस्‍तेमाल बंटवारा करने के संदर्भ में किया जाता है यानी ऐसा बंटवारा जो बराबर हो, अकेले बराबर का भाग के लिहाज से कोई मतलब नहीं बनता।

आपको यह भी लग सकता है कि लेखकों का एक मकसद बच्‍चों को निर्देश पढ़ कर समझने में काबिल बनने की काबिलियत का विकास करने की राह में रोड़े  अटकाना है इसलिए वे ऐसी भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं जिसे पढ़ कर या सुन का समझना मुश्किल हो। जैसे,

‘’नीचे दी गई तालिका 1 व 2 में चित्रों को देखिए गिनिए एवं बराबर से बराबर को मिलाइए’’
‘’नीचे तालिका में माला एवं खुले मोतियों को गिनिए सामने वाली तालिका से बराबर अंकों से मिलान कीजिए’’


पहले निर्देश में ‘चित्रों’ को ‘बराबर’ से जानबूझ कर दूर रखा गया है ताकि बराबर शब्‍द को सुनते वक्‍त बच्‍चों के दिमाग में उसका कोई मतलब न बन पाए। एक ही वाक्‍य में तीन निर्देश ठूंस दिए गए हैं। दूसरे निर्देश में गिनवा कर, बराबर अंकों से मिलान करने को कहा है। ये बराबर चीजें तो आपने सुनी होगी लेकिन ये बराबर अंक क्‍या होता है भई, इसे आप तलाश करते रहिए। दोनों वाक्‍यों की बुनावट तो आप देख ही रहे होंगे कि कैसी है। आप अफसोस ही जाहिर कर सकते हैं कि इन किताबों के लेखकों के लिए लिए एक वाक्‍य के निर्देश भी ठीक से लिख पाना इतना मुश्किल क्‍यों है, उन्‍होंने तो इसे लिख कर छोड़ दिया आखिरकार, इसे भुगतना तो बच्‍चों को ही है। 

अब हम अवधारणा सिखाने के तरीके पर आते हैं। पेज क्रमांक 63 पर बराबर बांट कर भाग करना सिखाने के लिए कार्टून विधि का इस्‍तेमाल किया गया है जिसमें अध्‍यापिका व बच्‍चों के चेहरे के चित्र तथा उनकी कही गई बातों को बुलबुलों में दिखाया गया है। अवधारणा का परिचय देने में तीन पन्‍नों की पर्याप्‍त जगह इस्‍तेमाल की गई है। आप खुश हो सकते हैं कि पहाड़े की मदद से भाग करने वाले पुराने तरीके से शुरूआत करने के बजाए ऐसा तरीका लिया गया है जिसमें बच्‍चों की रूचि भी हो और वे उसमें कुछ काम साथ साथ करके समझ भी पाएं। लेकिन पन्‍ने को देखने के बाद मिली खुशी, उसे पढ़ना शुरू करते ही काफूर होने लगती है।

भाग को सिखाने की शुरूआत में अध्‍यापिका अपने सामने पांच थालियां रख कर व उनमें तीन तीन लड्डू रख कर पूछती है – ‘’5 थालियां जिसमें 3-3 लड्डू हैं, तो बताइए कुल कितने लड्डू हैं।‘’ हरेक थाली के नीचे एक बच्‍चे का नाम लिखा है। एक लड़का गिन कर बताता है, -‘’बहन जी! 15 लड्डू हुए। एक लड़की बोलती है, ‘’सभी में बराबर बराबर तीन लड्डू हैं।‘’

अब आप अपने सर से दो तीन बाल नोचने से खुद को नहीं रोक सकते। अपने गुस्‍से पर थोड़ा काबू रखिए, अभी तो इसकी शुरूआत ही हुई है। इस पाठ का मकसद, बराबर बांट कर भाग सिखाना है या गुणा। अगर इस पाठ का मकसद बराबर बंटवारे की मदद से भाग सिखाना है तो शुरूआत गुणा व भाग के संबंधों से क्‍यों की जा रही है। मेरा ऐसा अनुमान है कि लेखकों ने संभवत: कहीं एक अच्‍छे विचार को सुना-पढ़ा होगा कि किसी भी नई अवधारणा को सिखाने से पहले उसे पूर्व ज्ञान से जोड़ना चाहिए। इस अच्‍छे विचार का एक सबूत वे आरंभ में ‘बंटवारे’ से तोड़ कर ‘बराबर’ की अवधारणा को सिखा कर दे चुके हैं। उससे भी उन्‍हें चैन नहीं पड़ा तो यहां उन्‍होंने यह सोच कर गुणा को ले लिया है कि चूंकि गुणा भाग से पहले सिखाया जाता है और दोनों का आपस में संबंध तो होता ही है इसलिए उसे भाग से पहले एक बार तरोजाता कर ही लेना चाहिए।

यह बात सही है कि गुणा व भाग का आपस में उलट संबंध है। लेकिन क्‍या इस संबंध का इस्‍तेमाल भाग सिखाने की शुरूआत में किया जाना चाहिए। क्‍या यह संबंध गुणा व भाग की समझ की बुनियाद बनने के बाद समझना आसान नहीं होता। क्‍या आप घटाव सिखाने की शुरूआत करते वक्‍त उसे जोड़ से उलट संबंध के तौर पर सिखाना आरंभ करते हैं। या घटाना अच्‍छी तरह से सिखाने के बाद जोड़ व घटाव, दोनों के संबंधों को सिखाते हैं। खैर इस पाठ में यह कोई पहली और आखरी समस्‍या तो है नहीं।

किताब में दी गई अब तक की बातचीत में किसी बच्‍चे का नाम नहीं लिया गया है ना ही पहले पन्‍ने के आखिर तक किसी का नाम लिया जाता है तो यह समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि थाली के नीचे बच्‍चों के नाम क्‍यों लिख दिए गए होंगे। इसी तरह लड़की द्वारा बोला गया वाक्‍य एक नकली वाक्‍य है और गैर जरूरी भी क्‍योंकि अध्‍यापिका ने तो यह बात पूछी ही नहीं। या तो आप यह बोलते हैं कि सभी में तीन तीन लड्डू हैं या फिर यह कि सभी में बराबर लड्डू है। वैसे भी गुणा का सवाल हल करने के बाद इस वाक्‍य को बोलने को कोई तुक नहीं। अगर आपकी निगाहें चित्र पर गई हों तो आप यह भी सोच सकते हैं कि क्‍या कोई थाली तीन लड्डुओं से पूरी भर जाती होगी।

अब अध्‍यापिका भाग सिखाने वाली बातचीत पर आती है। वह पूछती है, ‘’यदि इन्‍हीं लड्डुओं को तीन थालियों में बराबर बराबर भरना है तो कितने कितने लड्डू आएंगे ? लड़की जवाब देती है, बहन जी! तीनों में बराबर-बराबर 5-5 लड्डू आएंगे।‘’ आप देख सकते हैं कि यहां बराबर बंटवारे का दिखावा तो हुआ लेकिन बराबर बंटवारा हुआ ही नहीं।

इस पूरी बातचीत को समझने की कुंजी लड़की के जवाब में बोले गए बहन जी शब्‍द के बाद लगे विस्मयादिबोधक चिन्‍ह में है। इससे आपको यह सुराग मिलता है कि भाग के सवाल का जवाब किसी प्रक्रिया से नहीं बल्कि एक किस्‍म के इलहाम से मिलता है।

इस बातचीत को विस्‍तार से समझने की जरूरत है। पूरे पन्‍ने पर कहीं भी लड्डुओं का वह समूह नहीं है, जिसे बराबर बांटा जाना है। कहां है 15 लड्डुओं की ढेरी। या तो पहले सवाल में तीन तीन लड्डू की थाली का चित्र है या दूसरे सवाल में पांच पांच लड्डू की थाली का चित्र। आप खोजेंगे तो बड़ी मुश्किल से लड़के की बात में 15 का जिक्र मिल जाएगा और अध्‍यापिका के सवाल में उन लड्डुओं का संदर्भ मिल जाएगा लेकिन बगैर संख्‍या का नाम बोले। यानी लेखक गणों ने लड्डुओं को अदृश्‍य कर दिया है। कहीं उनहें यह डर तो नहीं सता रहा था कि आरंभ में 15 लड्डुओं के चित्र देने से बच्‍चे कहीं गलती से भी उन लड्डुओं की ढेरी को गिन कर उसका मतलब न समझ लें।

फिर भी, यह तो इस संवाद की आंरभिक अड़चन है। इस संवाद में सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि पहले सवाल आता है और उसके बाद शब्‍दों में जवाब भी आ जाता है। तो इसमें किसी को क्‍या एतराज होना चाहिए। एतराज यह है कि इस पूरे तामझाम में भाग की संक्रि‍या तो होती कहीं भी नहीं दिख रही जिसे समझाने के लिए चित्र बनवाए गए व बातचीत के इतने पापड़ बेले गए थे। जवाब देने वाली लड़की को कैसे पता चला कि तीनों में बराबर लड्डू आएंगे। चित्र से कहीं यह पता नहीं चलता कि अध्‍यापिका के सवाल का जवाब निकालने के तीन खाली थालियां लेनी पड़ती है फिर उनमें अपने पास मौजूद उन अदृश्य लड्डुओं की कल्‍पना करनी पड़ती है व अंत में उनमें से एक एक को प्रकट करवा कर बांटना भी पड़ता है तब कहीं जाकर पता चलता है कि हरेक थाली में कितने कितने आएंगे और यह भी कि वे बराबर हैं या नहीं।

आप यह भी कह सकते हैं कि लड़की ने चित्र देख कर जवाब थोड़े ही दिया वह तो अध्‍यापिका की बात सुन कर जवाब दे रही है। तो सवाल उठ सकता है कि फिर थालियों में लड्डू दिखाने की जरूरत ही क्‍या थी। वैसे अगर चित्र देख कर वह जवाब देती तो यह कह सकती थी कि तीनों थालियों में 5 – 5 लड्डू हैं। लेकिन यहां पर एक नई मुश्किल यह भी है कि चित्र तो ऐसे हैं नहीं कि वह उन्‍हें देख कर व गिन कर बता पाए।

इस पन्‍ने से आप इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि भाग का सवाल हल करने के लिए किसी किस्‍म का कोई काम करने की जरूरत नहीं है। सवाल सुनते ही आपके दिमाग में जवाब आ जाता है। और नहीं आए तो जवाब का न समझ आने लायक फोटो देख कर तो कैसा भी जवाब हो, आ ही जाता है। 

इसी प्रगटीकरण या इलहाम की प्रक्रिया से अगले पन्‍ने पर दिए सवाल का जवाब चित्रित लड़के के दिमाग में रोशन हो जाता है।

इसके बाद लेखकों को लगा कि दो बार जवाबों का इलहाम करवाना तो काफी हो गया सो अब थोड़ा बहुत भाग की संक्रिया का दिखावा भी कर लिया जाए। चित्र बना कर किसी अवधारणा को सिखाना तो अच्‍छी बात मानी जाती है न। तो पेज क्रमांक 64 पर वे एक सवाल देते हैं जिसमें 12 गेंदों को 2 बच्चों में बांटना है। पन्‍ने की बची खुची जगह पर वे कांच की गोली के आकार की गेंदे बना कर उनके नीचे दो बच्‍चों के चित्र बना देते हैं। पहली छह गोलीनुमा गेंदों को पहले बच्‍चे तथा बाकी छह गोलीनुमा गेंदों को दूसरे बच्‍चे के सिर पर रखे गोले से जोड़ देते हैं। बच्‍चों को सिर्फ यह करना है कि छह गोलीनुमा गेंदों को गिने व उनसे जुड़े खाली गोले में लिख दें।

काम करवाया छह गेंदों को गिनवा कर लिखवाने का और दिखावा किया बराबर बांट कर भाग सिखाने का। अपने सिर के दो चार बाल और यह सोच कर नोच लीजिए कि दो पन्‍नों में लेखकों ने कितनी मेहनत की है छह गोलीनुमा गेंदों को गिनवाना सिखाने में। चलिए आपको याद दिला दूं कि 50 तक की संख्‍याएं तो बच्‍चा कक्षा 1 में ही गिनना सीख चुका होना चाहिए। आप थोड़ा चैन की सांस तो ले ही सकते है कि यहां तक आते आते बच्‍चे को कम से कम गिन कर लिखने के अभ्‍यास का मौका तो मिला। 

अब तक आपको यह समझ में आ ही गया होगा कि असली माजरा तो यह है कि लेखकगणों को चित्रों के जरिए बच्‍चों से बराबर बंटवारा करवा कर भाग सिखाना आता ही नहीं है। इसलिए वे कहीं भी सवाल को हल करने के लिए भाग की प्रक्रिया का इस्‍तेमाल नहीं करते। वे सवाल लेते हैं। उसका जवाब उन्‍हें पता है, इसलिए वे जादूगर की तरह अपनी दायीं या बायीं जेब से जवाब निकालते हैं और उसी जवाब को चित्र के जरिए दर्शा देते हैं और इस काम के जरिए उम्‍मीद यह करते हैं कि बच्‍चे भाग को बराबर बांटने की प्रक्रिया के तौर पर सीख जाएंगे। 

इसका सबूत अगले ही पेज क्रमांक 65 पर फिर से मिल जाता है, जब वे इन्‍हीं 12 गेंदों को(जो तस्‍वीर में गोली के आकार से बड़ी हो चुकी होती है) तीन बालकों में बंटवाने को चित्र में दर्शाते हैं। चित्र वाला बच्‍चा खुश होकर लेखकगणों की जेब से निकले जवाब को बोल देता है।

आप लेखकों की हिम्‍मत की दाद ही दे सकते हैं कि जो काम जिस तरीके से उन्‍हें तक करना नहीं आता, उसकी काम को करने के लिए वे तीसरे पन्‍ने पर बची खुची जगह का इस तरह इस्‍तेमाल करते हैं कि अगर कोई बच्‍चा खुद के बूते करना भी चाहे तो जगह की तंगी के चलते करने की सोच ही न सके। अफसोस यहां पर लेखकगणों की जेब से निकला जवाब मौजूद नहीं है। और भाग के सवाल का जवाब खोजने की प्रक्रिया लेखकों ने उसे इन तीन पन्‍नों में अब तक सिखाई ही नहीं। 

आप जैसे ही पेज क्रमांक 66 पर दिए गए अभ्‍यास पर आते हैं तो पहले ही सवाल से साफ हो जाता है कि लेखकों का मकसद तो पहाड़ों को बोल कर भाग करना सिखाना था। यहां पर भी दिखावे के लिए वस्‍तु, डिब्‍बों की संख्‍या तथा प्रत्‍येक में कितने कितने भरेंगे, यह पूछा गया है। लेकिन चूंकि किताब में चीजों की मदद से बराबर बांट कर हल करना सिखाया ही नहीं गया तो अध्‍यापक व बच्‍चों के पास एक ही बरसों से आजमाया हुआ रास्‍ता बचता है - पहाड़े बोल कर भाग के सवाल हल करने का। तो आप पहाड़े बुलवाइये और भाग सिखाइए क्‍यों इतना परेशान होते हैं बराबर बंटवारा करके भाग सिखाने की मशक्‍क्‍त करने में।लेखकगण रचनावाद से सिखाने का दिखावा करते करते पहाड़ों से भी भाग करने का परिचय  नहीं करवा पाते।

रवि कांत




Sunday, 5 June 2016

मन गणित (कक्षा 5 - प्रश्‍नावली 17.2)




मन गणित वाले पाठ की आखिरी प्रश्‍नावली  17,2 काफी हैरतअंगेज तरीके से बनाई गई है। इससे पिछली प्रश्‍नावली(जिसका फोटो यहां नहीं लगाया गया है)  में भले ही बहुत ही कम जगह रखी गई, लेकिन वहां भी कम से कम चुटकी भर जगह तो छोड़ी गई है जिसमें अगर बच्‍चा उन सवालों को हल कर पाए तो कम से कम किसी तरह लिखने की कोशिश भर तो करे। इस पन्‍ने पर आते ही लेखकों को उतनी जगह छोड़ना भी कबूूल नहीं। 

एक तरह से देखें तो इस प्रश्‍नावली के पहले सवाल के अंतर्गत दिए सभी छह सवाल गलत हैं। क्‍योंकि किसी भी सवाल का जवाब उसके नीचे दिए जवाबों से मेल नहीं खाता। और पाठ पढ़ाते वक्‍त लेखकगणों ने यह तो सिखाया ही नहीं कि दिए गए तीन जवाबों मेें से उपयुक्‍त जवाब न मिले तो क्‍या करें और ना ही उन्‍होंने चौथे विकल्‍प की कोई संभावना रखी है। जैसे 40 में 30 जोड़ने पर 70 आते हैंं लेकिन 1(iii) में दिए गए तीनों जवाबों में 70 केे लिए कोई जगह नहीं है। वहां पर 106, 057 व 086 ने कब्‍जा किया हुआ है जो कि गलत जवाब हैं। 

सवालों की भाषा को जानबूझ कर बोलचाल की भाषा से काट कर रखा गया है ताकि गलती से भी कोई बच्‍चा अगर इसे पढ़ भी ले तो समझने से तीस कोस दूर ही रहे। जैसे, क्‍या संक्रिया कराई जाए कि उत्‍तर 54 प्राप्‍त हो, उत्‍तर सदैव शून्‍य प्राप्‍त हो, दोनों के स्‍थान पर शून्‍य प्राप्‍त है, आदि। वाक्‍य के अंंत में कहीं 'हो' तो कहीं वही हो, 'है' हो जाता है। 

सवाल क्रमांक दो से 2 से 11 तक ऐसे सवाल दिए गए हैं जिन्‍हें हल करने का तरीका पाठ में सिखाया ही नहीं गया। आम तौर पर गणित की पाठ्यपुस्‍तकों में इस रिवाज का ख्‍याल रखा जाता है कि जिस तरह की अवधारणा व सवालों के उदाहरण पाठ में समझाए गए हों उसी तरह के या उससे मिलते जुलते सवालों को प्रश्‍नावली में दिया जाए। ताकि बच्‍चे पाठ में दी गई अवधारणा व उसके साथ दिए गए उदाहरणों को समझ को प्रश्‍नावली में दिए गए सवालों को हल कर सकें। कई बार इक्‍का दुक्‍का ऐसे सवाल भी दिए जाते हैंं जो पाठ में दिए गए उदाहरणों से बनी समझ के सामने चुनौती पेश करके उसे थोड़ा फैलाएं ताकि बच्‍चे चुनौतियों से जूझने का आनंंद महसूस कर सकें। 

लेकिन इस पाठ के संदर्भ में ऐसा लगता है कि लेखकगण इस रिवाज से इत्‍तेफाक नहीं रखते। संभवत: उनकी मान्‍यता यह है कि पाठ में भले ही कुछ भी व कैसे भी पढ़ाया गया हो, अंत में दिए किसी भी किस्‍म के सवालों को हल करने का जिम्‍मा बच्‍चों का है। वैसे ही जैसे शिक्षा व्‍यवस्‍था कैसी भी हो, पास फेल होने का बोझ तो बच्‍चों को ही उठाना है। 

पाठ व प्रश्‍नावली को मिला कर देखें तो ऐसा लगता है कि लेखकगण संभवत: यह मान कर चल रहे हैंं कि यह मन-गणित वन-गणित सरकारी स्‍कूलों के बच्‍चों के बस की चीज तो है नहीं, तो इस पाठ को बनाने में सर खपाने की क्‍या जरूरत है। जैसा तैसा बन जाए वैसा बना दो और किताब में लगा दो क्‍या फर्क पड़ता है। पाठ व उसके अभ्‍यास को बनाने में लेखकगणों, शिक्षा अध्‍ािकारियों व उसे तुरत फुरत छाप देने के लिहाज से प्रकाशकों की लापरवाही के आधार पर भला आप इसके अलावा और किस नतीजे पर पहुंच सकते हैं।

रवि कांत

Saturday, 4 June 2016

मन-गणित (कक्षा 5 अध्‍याय17)


 

कक्षा 5 की पाठ्यपुस्‍तकों का आखिरी पाठ मन-गणित है। मन-गणित यानी गणित के काम काज को मन में कर पाने की काबिलियत। इस लिहाज से इस पाठ का मकसद बच्‍चों में मन-गणित की काबिलि‍यत को विकसित करना होना चाहिए। वैसे मन-गणित अंग्रेजी के मेंटल मैथ का खराब हिंदी अनुवाद है। ज्‍यादा बेहतर होता कि इसका नाम मौखि‍क गणित रखा जाता। इसे देखते ही आप हैरान ही हो सकते हैं कि कक्षा 1 से 4 तक तो मन-गणित पर कोई पाठ नहीं है , कक्षा 5 से 8 तक में भी इस तरह का कोई पाठ नहीं है, अचानक कक्षा 5 में यह पाठ क्‍यों‍कर प्रकट हो गया होगा। क्‍या कक्षा 1 से 4 तक के 6 से 10 साल की उम्र तथा कक्षा 6 से 8 तक के 12 से 14 साल की उम्र के बच्‍चों के साथ इस मुंहजुबानी ग‍णित पर काम करने की जरूरत नहीं है। 10 साल की उम्र में ऐसी क्‍या खास बात है कि इसे लेने की जरूरत पड़ गई है। तो इस पहेली को आप चैन से हल करते रहिए।  

पहली और आखरी बार कक्षा 5 में प्रगट होने के अलावा भी यह पाठ कई किस्‍म की मुसीबतों का मारा है। अभी हम मोटे तौर पर इसके पहले पन्‍ने पर ही बात करेंगे। 

पहली, इस पाठ के विषयवस्‍तु पर ध्‍यान दें तो इसकी मान्‍यता यह है कि संक्रियाओं को छोड़ कर किसी भी अवधारणा में मन-गणित का काम करने की जरूरत नहीं है चाहे वो संख्‍याएं हों या ज्‍यामिति हों या आंकड़े हों या मुद्रा, समय, भार, लंबाई आदि हो। संक्रियाओं में भी जोड़ व घटाव में चार अंकीय संख्‍याओं तक और गुणा व भाग में एक अंकीय संख्‍याओं तक ही मन गणित की जरूरत है। इसके बाद उसकी कोई जरूरत नहीं। इस नतीजे पर लेखक समूह कैसे पहुंचा यह तो वह ही बता सकता है। मेरी जानकारी में अभी तक तो देशी व परदेशी ऐसा कोई शोध उपलब्‍ध नहीं है जो यह बताता हो कि मन-गणित को सिर्फ और सिर्फ कक्षा 5 में तथा 10 साल की उम्र वाले बच्‍चों को ही करवाया जाना चाहिए, ना तो उससे पहले व ना उससे बाद।

दूसरी, मौखिक गणित सिखाने के लिए जो तरीका उदाहरण में चुना गया है वह बहुत ही हास्‍यास्‍पद है। लेखकगण ने एक सवाल लिया है। उसके तीन संभावित उत्‍तर दिए हैं। अब बच्‍चे को यह पता लगाना है कि इनमें से सही जवाब कौनसा है। और इसका तरीका यह बताया गया है कि तीन में से दो गलत जवाबों का पता लगा लो तो बचा हुआ जवाब सही हो जाएगा। अब आप थोड़ी कल्‍पना करिए कि आपको मौखि‍क गणित की जरूरत कब पड़ती है। अक्‍सर आप बाजार में खरीदारी करते हैं, उसी वक्‍त ना। तो इस तरीके से सीखने के बाद आपको करना यह होगा कि अगर आपको कोई दो संख्‍या जोड़नी या गुणा करनी है तो आप दुकानदार से कहें कि तुम तीन विकल्‍प बताओ तभी मैं हिसाब लगा कर बताऊंगा कि तुम्‍हारा कौनसा विकल्‍प सही है। है ना हास्‍यास्‍पद बात। दुकानदार आपकी तरफ देख कर सोचेगा कि किसने आपको बेवक्‍त खुला छोड़ दिया है और आप तरस खाकर खुद ही हिसाब लगा कर बता देगा। लो आपकी मन गणित तो मन की मन में रह गई। यानी यह तरीका एक बहुत ही व्‍यवहारिक तरीके को अव्‍यवहारिक बना देता है। 

तीसरी, उदाहरण के लिए दो सवाल चुने गए हैं, 72 + 4__  = ____ तथा 2__4 – 6__ = ___ । इन सवालों के चयन पर भी कई तरह के सवाल उठते हैं। पहला, अभ्‍यास में दूसरे सवालों के साथ एक अंकीय जोड़ व घटाव के सवाल भी दिए गए हैं लेकिन समझाने के लिए दो या तीन अंकीय जोड़ के सवाल दिए गए हैं। क्‍या यह माना जा रहा है कि एक अंकीय सवाल ज्‍यादा कठिन होते हैं इसलिए उनसे 'सरल' दो या तीन अंकीय सवालों को समझाया जाए। दूसरा, इन सवालों के लिए कोई संदर्भ नहीं बनाया गया है जबकि सवालों को मौखिक तौर पर हल करने की ज्‍यादातर जरूरत रोजमर्रा के कामकाज में पड़ती है। तीसरा, इन सवालों का चयन मौखिक तौर पर सवालों को हल करना सिखाने के लिए किया गया है या अटकाने के लिए। इन सवालों में दो चुनौतियां हैं एक तो संख्‍याओं में छोड़े गए अंक या अंकों का अनुमान लगाना व दूसरा संख्‍याओं के योगफल या शेषफल का अनुमान लगाना। किन्‍हीं दो संख्‍याओं के साथ मौखिक संक्रिया करना ही अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम होता है तिस पर उन संख्‍याओं में से अंकों को गायब करके उसे दोहरा तिहरा चुनौतीपूर्ण करने का मकसद बच्‍चों को कम से कम मौखिक गणि‍त में माहिर बनाना तो नहीं ही हो सकता।

चौथा, लेखक गणों द्वारा अनुमान के लिए लिखी गई बातों पढ़ने पर साफ लगता है कि उन्‍होंने उनके बारे में खुद भी नहीं सोचा है। शायद उनके सर पर भी गणित का भूत इतना सवार रहा हो कि वे एक बार लिखने के बाद दोबारा उसे पढ़ने की हिम्‍मत ना कर पाते हों। जैसे, जोड़ के सवाल के लिए उन्‍होंने एक लड़की से इस तरह विचार करवाया, ‘’पहली संख्‍या 72 है और दूसरी संख्‍या 50 से कम है इसलिए उसकी जोड़ 145 नहीं हो सकती।‘’ इस पूरी बात में सिर्फ पहली बात संख्‍या सवाल देख कर पता चल जाती है। लेकिन दूसरी संख्‍या के बारे में कैसे पता चला कि वह 50 से कम है, इस बारे में कोई विचार या तर्क लेखकों के दिमाग में पैदा नहीं होता। वे उस तर्क को शब्‍दों में नहीं लिखते जिसे पढ़ कर समझ आए कि क्‍यों 4 से आरंभ होने वाली दो अंकों की संख्‍या 50 से छोटी ही होगी। इसी तरह उनके दिमाग में वह विचार भी पैदा नहीं होता जिसकी मदद से इस नतीजे तक पहुंचा जा सके कि 72 व 50 मिल कर 145 नहीं हो सकते। यानी लेखकों ने लड़की को बिना कोई तर्क किए ऐसे नतीजों पर पहुंचा दिया है जिसका बुनियादी तर्क विचार करते वक्‍त उसके पास भाषा में बना ही नहीं। ऐसी ही समस्‍या लड़के द्वारा किए गए तर्क में भी है कि वह जिन नतीजों को सोच रहा है उससे जुड़े बुनियादी तर्क उसके पास नहीं हैं।

पांचवां, इस पूरे पन्‍ने की भाषा ऐसी है कि यह अध्‍यापक को संबोधित है। जैसे, ''अध्‍यापक एक अभ्‍यास बोेर्ड पर लिखते हैं . . . ।'' आप पूछ सकते हैं कि यह किताब बच्‍चों के लिए है या अध्‍यापक के लिए। अगर यह बात बच्‍चोंं को नहीं पढ़नी तो इसमें लिखी क्‍यों गई है। इसी तरह से लेखकों को सवाल व अभ्‍यास का फर्क शायद नहीं पता इसलिए वे सवालों को पूरे पाठ में अभ्‍यास कह कर बुलाते हैं। पाठ में आई बिंदी का हाल यह है कि उसे जहां होना चाहिए वहां नहीं होती जैसे जोड़़ में ड के नीचे और जहां नहीं होना चाहिए वहां आ कर ठसक के साथ बैठ जाती है जैसे हो में मात्रा के साथ। फोंट का ये हाल है कि वो कभी छोटा हो जाता है तो कभी बड़ा, जैैसे उसे यह समझ में नहीं आ रहा हो कि उसे कब किस आकार में रहना चाहिए।  

मन-गणित वाला पाठ इस बात का एक बेहतरीन नमूना है कि ये किताबें किस कदर हड़बड़ी में बनाई गई है। इतनी हड़बड़ी कि संख्‍याओं और संक्रियाओं पर काम करने की कार्यनीतियों को विकसित करने के काम के साथ पाठ्यपुस्‍तक में इस तरह का बरताव किया कि कोई बच्‍चा तो बच्‍चा, अध्‍यापक तक उसका इस्‍तेमाल करने की हिम्‍मत ही ना कर पाए। दुनिया भर में गणित के अभ्‍यासकर्ता व शोधकर्ता संख्‍याओं व संक्रियाओं को समझने के लिए मौखिक कार्यनीतियों को न सिर्फ काम ले रहे हैं बल्कि अपने स्‍कूलों में व्‍यवस्थित तरीके से उस पर काम भी कर रहे हैं। वे न सिर्फ इन पर कार्यनीतियों की मदद से गणित की अवधारणाओं के साथ मौखिक काम करना सिखाते हैं बल्कि मौखिक गणित के वक्‍त काम लिए गए तरीकों व कार्यनीतियों का गणितीय निरूपण करना भी सिखाते हैं ताकि बच्‍चे अपने रोजमर्रा के गणना संबंधी कामकाज का गणितीय निरूपण करने के साथ साथ गणित को अपनी जिंदगी से भी जोड़ कर समझ सके व अपनी गणितीयकरण की काबिलियत को बढ़ा सकें और गणितीय तौर तरीकों से चिंतन करना सीख सके जो कि राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के मुतााबिक गणित शिक्षण का सबसे प्रमुख मकसद है।  

रवि कांत