Monday, 13 June 2016

नई पाठ्य-पुस्तकों के लेखक अल्प-ज्ञानी हैं या बहुत लापरवाही से पाठों को लिखा गाय है ? 'पर्यावरण अध्ययन' कक्षा तीन के तीसरे घटक 'हम और हमारा खान-पान' से सम्बंधित पाठो को पढ़ने के दौरान,यह प्रश्न बार-बार मुझें परेशान करता रहा था !

1.एन.सी..आर.टी.की पुस्तक में इस घटक से सम्बंधित दो पाठ हैं | इन पाठों में कुल 8 चित्र हैं जो बच्चों को पर्यावरण के प्रति और ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं | 15 गतिविधियाँ है जो कि अध्ययन की प्रक्रिया पर बच्चों की पकड़ को मजबूत बनाते हुए, बच्चे अपने आस-पास व पूरी दुनिया में खाए जाने वाले खाद्य-पदार्थों से परिचित कराती हैं,बिना मतारोपण के | इन दो पाठों में कुल 18 प्रश्न है जिन पर बच्चों को बार-बार सोचने व चर्चा के अवसर उपलब्ध कराए गए हैं |
2.सत्र 2015-16 में चल रही, एस.आई..आर.टी.की पुस्तक में इस घटक से जुड़े तीन पाठ है | इन पाठों में 24 चित्र हैं, गतिविधियाँ हैं और 20 प्रश्न हैं | बच्चों की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पाठ को बहुत प्रभावी तरीकों से बुना गया है |
3.सत्र 2016-17 के लिए बनाई गई नई पाठ्य-पुस्तक में भी इस घटक से सम्बंधित दो पाठ है | इन पाठों में केवल 5 चित्र हैं,7 गतिविधियाँ हैं और 20 प्रश्न हैं | अधिकतर प्रश्नों को इस प्रकार से बनाया गया है कि इन प्रश्नों में बच्चे से सिर्फ पाठ में दी गई जानकारियों को याद रख लेने व बहुत ही सामान्य जानकारियों को बता देने की अपेक्षा की गई है |
नई पुस्तकों के इन पाठों को पढ़ते-पढ़ते मुझें एक घटना भी बार-बार याद आती रही थी | कुछ वर्षों पहले मैं 'केकड़ी'नगर में रहता था | कड़क सर्दी की एक शाम,एक मित्र के साथ 'मटन' खाने की इच्छा हुई | ऐसा भोजनालय खोजा गया | एक गली, फिर उसमें भी एक गली, गली के एकदम से लास्ट कोने में यह दुकान थी | हमने दुकान वाले से पूछा कि यार सभी तो दुकाने ऐसी जगह खोलते हैं जहां लोग आसानी से पहुँच सकें | आपने एकदम ऐसी छुपी हुई जगह पर खाने की दुकान क्यों खोली है ? उन्होंने बताया कि मेरी दुकान इस कारण से ही चलती है कि यह ऐसी जगह है | क्योंकि मेरे यहाँ जो ग्राहक आते हैं वे छुपकर ही खाने वाले लोग हैं |

नई पुस्तकों के लेखक हमारी नई पीढ़ी को ऐसा ही बनाना चाहते हैं ताकि इच्छा होने पर वें मांसाहारी खाना छिपकर हो खा सकें | क्योंकि नई पुस्तक के दोनों पाठो में बच्चों को यह जानकारी दी गई है कि राजस्थान के लोग विविधता के नाम पर या तो बाजरा खाते हैं या गेंहूँ खाते हैं या मक्का खाते हैं या चावल खाते हैं | मछली व समुंद्री जीव तो समुन्द्र के पास रहने वाले खाते हैं | ये ही नहीं जो समाज में परम्परा से चला आ रहा है, इन पाठों के माध्यम से लेखक उन्हीं परम्पाराओं को बच्चों पर थोपना चाहते हैं |  

- कमल 

Sunday, 12 June 2016

बराबर बंटवारा (कक्षा 2 - अध्‍याय 9) -भाग दो


बार बार घटा कर भाग करना




बराबर बंटवारे को बंटाधार करके ही लेखकगणों का मन नहीं भरा तो उन्‍होंने इसी पाठ में बार बार घटा कर बचे खुचे भाग को भी इस हड़बडी़ में निपटा दिया जैसे उनके पीछे गणित के भूत लगे हों। बराबर बांटने को समझाने में उन्‍होंने अपने हिसाब से तो पांच पन्‍ने लगाए थे। यह बात दूसरी है कि पहले दो पन्‍नों में उन्‍होंने बेचारे भाग को किताब में दाखिल होने जगह ही नहीं दी और बाकी तीन पन्‍नों में वे पूरी मेहनत करने के बावजूद बच्‍चों से भाग की प्रक्रिया करवा नहीं पाए। लेकिन इस सारी जद्दोजहद में लगी अच्‍छी खासी मेहनत से थक हार कर उन्‍होंने बार बार घटा कर भाग करने की अवधारणा को सिखाने का काम एक पन्‍ने में ही पूरा कर दिया। आखिर कब तक कोई लेखक, शिक्षक व बच्‍चे की बातचीत लिखता रहे और हर पन्‍ने पर चीजों को चित्रों में बार बार बंटवाने के बारे में सोचता रहे, खास तौर पर ऐसे लेखक जिन्‍हें खुद भी चीजों के चित्रों व बातचीत के जरिए भाग करना व सिखाना आता ही न हो।

सो बुरी तरह से थके हारे लेखकगणों ने पहला काम यह किया कि पहली बार झाड़ू फिराई और बच्‍चों को पन्‍ने से बाहर कर दिया। ना रहेगा बच्‍चा और ना ही बचेगा सिखाने की बांसुरी बजाने का कोई झंझट। हो सकता है कि उन्‍होंने सोचा हो कि जब सब हमें ही बताना है तो बच्‍चों को किताब के पन्‍ने पर दाखिल करने की क्‍या जरूरत। फिर दूसरी बार झाड़ू फिराई और चीजों के चित्रों को भी इस पन्‍ने से बाहर का रास्‍ता दिखा। तो अब इस पन्‍ने पर क्‍या बचा। अध्‍यापिका और सवाल। जिसको सीखना है वो किताब से बाहर ही रहे, काहे को मुंह उठाए किताब के अंदर को चला आता है, अपनी किताब समझी है क्‍या!  

अब अध्‍यापिका पन्‍ने की शुरूआत में पन्‍ने से बाहर निकाल दिए बच्‍चे से कहती है, ‘’आओ अब संख्‍याओं काा बंटवारा निम्‍न प्रकार से करते हैं।‘’ जैसे ही बच्‍चों को पन्‍ने से बाहर खदेड़ा, तो शिक्षिका की भाषा एकदम अमूर्त हो जाती है। वह अब चीजों को बांटने की बात नहीं करती, अब संख्‍याओं के बंटवारे की बात करने लगती है। यानी इस बात को पढ़ या सुन कर बच्‍चों के दिमाग में किसी किस्‍म की कोई भी तस्‍वीर बनने की रत्‍ती भर भी गुंजाइश नहीं बचती।

बच्‍चों के सामने पहली बार, बार-बार घटा कर किए जाने वाले भाग को सिखाने के लिए जिस भाषा में और जो सवाल चुना गया है वह इस बात का बेहतरीन नमूना है कि कैसा सवाल चुना जाए कि उसे सुन कर बच्‍चों को कड़क ठंड में भी पसीना चूने लगे । जरा देखिए, ‘’10 पुस्‍तकों को कितनी बार बराबर बांटें कि सभी को समान पुस्‍तकें प्राप्‍त हों ?’’ आप सर खुजाते रहिए कि इससे आप क्‍या समझे। इतना मत खुजा लीजिएगा कि सर से खून निकलने लग जाए ।

इस सवाल की बुनावट में दो तीन समस्‍याएं हैं जिन्‍हें मैं एक एक करके आपके सामने रखने की कोशिश करूंगा।

पहली समस्‍या यह है, कि इस सवाल में जो ‘’कितनी बार बराबर बांटे’’ वाक्‍यांश आया है उसका मतलब आसानी से समझ नहीं आता। भाग के दो अलग अलग अवधारणात्‍मक अर्थ होते हैं। एक में आप कुछ चीजों को कुछ लाेेगों में बराबर बांटते हैं और अंत में यह पता लगाते हैं कि हरेक को कितनी मिली। दूसरे अर्थ में आप कुछ कुछ चीजों में से एक ही संख्‍या में चीजें बार बार निकालते हैं और अंत में यह पता लगाते हैं कि कितने व्‍यक्‍तियों को मिलींं। कितनी बार बराबर बांटे वाला वाक्‍यांश दोनों अर्थेां को मिला कर इस पन्‍ने पर कुुछ ऐसा रायता फैलाते हैं कि आखिर तक लेखक गण भाग को समझाने में नाकाम ही रहते हैं।

दूसरा, कितनी बार बराबर बांटे वाले वाक्यांश के अटपटेपन को समझने का एक तरीका यह हो सकता है कि आप कुछ बच्‍चे लें व उनमें पुस्‍तकों को बांट कर देखें। जैसे,

1.       20 बच्‍चे लेकर उनमें 10 पुस्‍तकें बांट कर देखें तो उनमें से 10 में से हरेक को 1 मिली व बाकी 10 को कोई किताब नहीं मिली। इस तरीके में आपने किताबें एक बार बांटी।
2.       इसी तरह 19/18।17 से लेकर 11 बच्‍चों में पुस्‍तकों बांटेे तो नतीजा पहलेे बिंदु वाला ही आयेगा।
3.       फिर आपने 10 बच्‍चे लेकर उनमें 10 पुस्‍तकें बराबर बांट कर देखी तो हरेक को समान संख्‍या में एक-एक पुस्‍तक मिली।
4.       9 से लेकर 1 बच्‍चे को लेकर उनके बीच 10 पुस्‍तकें बांट कर देखी तो 9/8/7/6/4/3 बांटी तो बराबर नहीं बंटी।
5.       5 व 2 बच्‍चे लेकर 10 पुस्‍तकें बांटी तो उनमें में हरेक को समान संख्‍या में 2-2 और 5-5 पुस्‍तकें मिलीं।
6.       1 बच्‍चे को दी तो सारी पुस्‍तकें एक को ही देनी पड़ी बराबर बांटने की तो नौबत ही न आई। एक को ही सभी चीजें दे देने को क्‍या आप बांटना कहेंगे।

आप देख सकते हैं कि इस सवाल को शब्‍दश: समझ कर हल करने के लिए आपको 20 बार अलग अलग संख्‍या में बच्‍चों की कल्‍पना करके पुस्‍तकें बांटनी पड़ी। उससे मिलने वाले नतीजों को व्‍यवस्थित रूप से दर्ज करना पड़ा। अंत में आपने पाया कि उन में से तीन हालात ऐसे हैं जब बच्‍चों को बराबर संख्‍या में पुस्‍तकें मिलती है। लेकिन एक सवाल में आपको एक बार, एक में दो बार और एक में पांच बार देनी पड़ी। तो आपके पास कितनी बार के तीन जवाब हैं और तीनों ही सही हैं। क्‍या आप कक्षा दो में भाग की शुरूआत में इतना मुश्किल सवाल बच्‍चों से हल करने की उम्‍मीद रखते हैं जिसे हल करके दर्ज करने की हिम्‍मत व समझ के कोई सबूत लेखकों तक में नजर नहीं आते। आपने ध्‍यान दिया होगा कि इस सवाल को हल करना कितना पेचीदा व मुश्किल काम है। और वह भी तब जब आपने बच्‍चों को बराबर बांटना अच्‍छे से सिखाया हो और बच्‍चे उच्‍च प्राथमिक में हों। आपको याद होगा कि यही लेखक पाठ के पहले हिस्‍से में बराबर बांटने की क्रिया करवाने में पूरी मेहनत के बावजूद नाकाम ही रहे थे।

दूसरी समस्‍या यह है कि इस सवाल में दो चीजें अज्ञात हैं। पहली, ‘’कितनी बार’’ की संख्‍या और दूसरी, ‘’सभी’’ की संख्‍या। यानी भाग को सिखाना शुरू करने के वक्‍त बच्‍चों से दो अज्ञात राशियों वाला सवाल पूछा जा रहा है।

आपको याद आ रहा होगा कि अज्ञात राशियों वाले सवाल तो आम तौर पर कक्षा 6 में बीजगणित के आरंभ होने के भी बाद, कक्षा 6 में समीकरणों पर काम करते वक्‍त पूछे जाते हैं। लेकिन यहां पर लेखकों ने कक्षा 2 में भाग को सिखाने के शुरूआती सवाल को ही कक्षा 6 व 7 के स्‍तर के सवाल में तब्‍दील करने की महारत दिखा दी है। यानी कक्षा 6-7 के स्‍तर का सवाल कक्षा 2 के बच्‍चों को दिया जा रहा है।

तीसरी व सबसे प्रमुख समस्‍या यह है कि इस सवाल को पढ़ने से यह पता नहीं चलता कि दी गई पुस्‍तकों को बराबर कैसे बांटा जाएगा ? और उन 10 पुस्‍तकों को कितने लोगों में बांटा जाएगा ?

इसके बाद उपसवाल के तौर पर एक सवाल और दिया गया है, जिसे रंगीन व मोटे अक्षरों में दिए गए प्रमुख सवाल से अलग किया गया है, ‘’जब 2 पुस्‍तकें दें तब’’। इस उपसवाल को अलग से देने की वजह साफ नहीं है क्‍योंकि लेखकों ने एक बार ही शर्त लगा कर सवाल को आगे हल कर दिया है। आगे उन्‍होंने जब 2/3/4/6/7/8/9/10 पुस्‍तकें देकर इस तरह का कोई नया सवाल नहीं पूछा तो पहले वाक्‍य में ‘’जब .... ‘’ की शैली का इस्‍तेमाल करने की क्‍या जरूरत थी।

अब अगर आप इस प्रमख सवाल व उपसवाल को मिला कर समझने की कोशिश करें तो मुश्किल यह आती है कि प्रमुख सवाल को 10 पुस्‍तकों को कितनी बार बराबर बांटने की बात कर रहा है और उपसवाल जब 2 पुस्‍तकें दे तब क्‍या होगा, की बात कर रहा है। अभी भी यह बात तो एक महा गोपनीय रहस्‍य ही है कि ये 10 पुस्‍तकें किसको देनी है। वैसे आपका ध्‍यान इस बात पर भी गया ही होगा कि प्रमुख सवाल में एक ही बात को दो बार दोहरा कर और उलझा दिया गया है – ‘’बराबर बांटे’’ तथा ‘’समान पुस्‍तकें प्राप्‍त हों’’ बराबर बांटने का मतलब ही यही होता है कि सभी को समान संख्‍या में पुस्‍तकें बांटी जाए। प्रमुख सवाल में एक शर्त को दो बार कहने का कारण भी गोपनीय ही है।

जिस ‘’कितनी बार’’ वाले सवाल को गाढ़े नीले अक्षरों के लिख कर बच्‍चों का ध्‍यान खींचने की इतनी मशक्‍कत लेखकगणों ने की, उनकी कलम की स्‍याही तब सूख जाती है जब वे 10 में से 2 को पांच बार घटाते हैं। उस वक्‍त वे हर बार यह कहने/लिखने की जरूरत नहीं समझते कि इस 2 को पहली बार, दूसरी बार  . . . . . पांचवी बार घटाया। या 2 को एक एक करके कुल 5 बार घटाया। संभवत: उन्‍होंने नीली व काली स्‍याही की बचत करने के मकसद से सफेद स्‍याही में सफेद कागज पर लिखा हो, जिसे आपकी, मेरी और बच्‍चों की निगाहें देख न पाती हो। आखिर दिव्‍य दृष्‍टि हरेक के पास थोड़े ही होती है।

इतनी मुश्किल व पेंचदार भाषा में सवाल गढ़ने व देने के बाद लेखकगणों को इस बात का पक्‍का भरोसा हो गया कि बच्‍चे 10 में से 2 व 8 में से 2 आदि घटाने का सवाल भी करने के काबिल नहीं हैं सो उन्‍होंने 10 में से 2 को एक एक करके पांच बार घटाया और आखिर में शून्‍य हासिल कर लिया। अजीब लेखक हैं कक्षा 6-7 के स्‍तर का सवाल बच्‍चों के पढ़ या सुन कर समझने की उम्‍मीद रखते हैं और कक्षा एक के स्‍तर के घटाने के सवाल को बच्‍चों से हल करवाने से कन्‍नी काट जाते हैं और सवाल का जवाब बताना भी भूल जाते हैं।

इसी पन्‍ने पर दूसरा सवाल देते वक्‍त किसी लेखक को इलहाम हो जाता है कि कुछ गड़बड़ हो रही है तो वे प्रमुख सवाल व उपसवाल को मिला देते हैं इस उम्‍मीद में कि शायद इससे दो की जगह एक ही अज्ञात राशि हो जाए। वे दूसरा सवाल कुछ इस तरह से गढ़ देते हैं, ‘’इन्‍हीं 10 पुस्‍तकों को कितनी बार बांटें कि सभी को 5-5 पुस्‍तक प्राप्‍त हो ?’’ वैसे हो सकता है कि उन पर पेज पर जगह कम रह जाने का दबाव रहा हो जिसकी वजह से उन्‍होंने उपसवाल को प्रमुख सवाल में मिला दिया। लेकिन इसके बावजूद सवाल में दो चीजें तो अज्ञात रहती ही हैं, एक तो – ‘’सभी’’ व दूसरा ‘’कितनी बार’’

तभी शायद लेखक समूह में से किसी को याद आता है कि अरे पहला सवाल पूरा हल तो करके दिखा दिया लेकिन उसका जवाब को बताया ही नहीं। तो दूसरा सवाल लिखने के बाद अध्‍यापिका प्रगट होकर पहले सवाल का जवाब कुछ इस तरह से देती है, ‘’10 पुस्‍तकों को 5 बार बांटने से सभी को 2-2 पुस्‍तकें मिलती हैं। यानी लेखकों ने खाली स्‍थान भरने की तकनीक का इस्तेमाल करते हुए, अपनी तरफ से सवाल में कितनी की जगह पर 5 रखा और समान की जगह पर 2-2 रख दिया। बार बार आकर बोलने वाली अध्‍यापिका आपको पुस्‍तक में यह नहीं बताती कि उसने इन10 पुस्‍तकों को कैसे बांटा।

आपको अगर अब तक यह पता नहीं चला कि अज्ञात राशि ‘’सभी’’ की संख्‍या कितनी है तो यह लेखकों का कसूर नहीं, उन्‍होंने तो भरपूर मेहनत करके आपको समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब आप चाहें तो दोबारा इसी पन्‍ने को बारीकी से एक नहीं सौ बार पढ़ जाइए और अज्ञात ‘’सभी’’ का पता लगाइए। आखिर आपको खुद में और बच्‍चों में ऐसी चीजों को खोजने की काबिलियत का विकास करना है या नहीं जो वहां पर हो ही नहीं। 

पहले सवाल के हल की घोषणा करने के बाद लेखकगण दूसरे सवाल को हल करके रख देते हैं। यहां तक आते आते किसी लेखक को फिर से यह इलहाम हो जाता है कि यह अज्ञात ‘’सभी’’ बेवजह गले की फांस बन रहा है सो वे जवाब में से ‘’सभी’’ पर झाड़ू फेर देते हैं। अब आप जवाब को पढ़िए। वह भी कोई सवाल से कम थोड़े ही है ‘’10 पुस्‍तकों को 2 बार बांटने पर 5-5 पुस्‍तकें प्राप्‍त  होती है’’ दस को आप दो बार बांटिए और जवाब में सिर्फ 5-5 पुस्‍तकें प्राप्‍त कर दिखाइए। मैंने बांटा तब मुझे तो कई जवाब मिले। जिसने भाग की अवधारणा के परखच्‍चे उड़ा दिए। जैसे,

1.   एक  को 1 व दूसरे को 9 मिली।
2.   एक को 2 व दूसरे को 7 व तीसरे को 1 मिली।
3.   एक को 2 व दूसरे को 4 व तीसरे को 3 व चौथे को 1 मिली।
4.   ...............
5.   इसी तरह पुस्‍तकें बांटने पर अलग अलग लोगों को अलग अलग संख्‍या में पुस्‍तकें मिली।

ऐसा इसलिए हो गया क्‍योंकि लेखकों ने सवाल में बराबर बांटने के लिए कब कहा था, उन्‍होंने तो सिर्फ कितनी बार बांटने को कहा था, सो बांटने का नतीजा ऊपर दिए तरीके से निकल आया।

मेरा अनुमान यह है कि लेखकगणों को, भाग की अवधारणा, न तो जब वे बचपन में किसी स्‍कूल में पढ़ते थे, तब समझ में आई, और ना ही खुद बड़े होने के बाद बच्‍चों को पढ़ाते वक्‍त समझ में आई, अगर वे कहीं पढ़ाते हैं तो। इन पुस्‍तकों में वैदिक गणित के नाम से कुछ गणना की तरकीबें वाले पाठ लिख कर जोड़ने की भरपूर मशक्‍कत के बावजूद उनकी खुद की भाग की अवधारणा की समझ में कोई फर्क पड़ा़ हो, ऐसा भी नजर नहीं आता।

असल में भाग की अवधारणा को दो तरह से समझा जाता है। एक तरीका होता है, बराबर बांटना व दूसरा तरीका होता है, बार बार घटाना।

बराबर बांटने में कुछ चीजों को कुछ व्‍यक्‍तियों में बांट कर यह पूछा जाता है कि हरेक को कितने मिले जैसे, 12 गेंदे 3 बच्‍चों में बराबर बांटी तो हरेक को कितनी कितनी गेंद मिली?  इस तरह के सवाल में दो चीजें हमें पता होती हैं, जैसे, कुल गेंदें तथा बच्‍चों की संख्‍या। करना क्‍या है, यह सवाल में दिया होता है कि बराबर बांटना है। तो बराबर बांट कर यह पता लगाना होता है कि हरेक को कितनी कितनी मिलेगी। इसे करने का तरीका यह होता है कि हरेक को बारी बारी से एक एक गेंद तब तक दी जाए जब तक कुल गेंदे खत्‍म ना हो जाए। फिर देखा जाए कि सबको बराबर बराबर मिली है या नहीं। अंत में हरेक को मिली गेंद की संख्‍या गिन कर जवाब का पता लगा लिया जाए। आपने ध्‍यान दिया होगा कि इसमें एक ही राशि अज्ञात है, जिसका पता लगाने के लिए कौनसी क्रिया करनी है इसका संकेत सवाल में मौजूद रहता है।

बार बार बांटने में कुछ चीजों में से बराबर मात्रा में चीजें एक एक व्‍यक्‍ति को देकर यह पूछा जाता है कि कुल कितने व्‍यक्‍ति को बराबर चीजें मिलीं। जैसे, आपके पास 12 गेंदें हैं आप एक बच्‍चे को 3 गेंदें देना चाहते हैं तो आप कितने बच्‍चों को दे सकते हैं ? 12 गेंदों में से एक बच्‍चे को 3 गेंदे दें तो कितने बच्‍चों को 3-3 गेंदें मिलेंगी ? इसमें बराबर मात्रा में दी जाने वाली गेंदों की संख्‍या पहले से तय है व सवाल में दी गई है आपको सिर्फ यह पता लगाना है कि वे कितने बच्‍चों को मिल सकती हैं। यानी बार बार घटा कर भाग करते वक्‍त आपको बराबर मात्रा का पता नहीं लगाना होता बल्कि उस मात्रा को पाने वाले व्‍यक्‍तियों की संख्‍या का पता लगाना होता है जो कि अज्ञात होता है।

एक अध्‍यापक को भाग की अवधारणा नहीं आती हो तो वह सिर्फ एक स्‍कूल के बच्‍चों को भाग सिखाने में नाकाम रह सकता है। लेकिन अगर एक राज्‍य की किताबों में भाग की अवधारणा का ठीक से नहीं दिया गया हो तो पूरे राज्‍य के दलितों, गरीबों, अल्‍पसंख्‍यकोंं के बच्‍चों व खास तौेर पर लड़कियों को गणित की एक जरूरी अवधारणा को सिखाने में नाकाम रहने का खतरा सामने खड़ा हो जाता है। आज हम इसी खतरे से दो चार हो रहे हैं। 

रवि कांत

राजस्थान के निवासियों के लिए,पानी की कमी से जूझना, बहुत अधिक चुनौतिभरा काम रहा है | चाहे गाँव हो या शहर, यहाँ के निवासियों ने इस चुनौती के कई रचनातमक हल खोजे हैं व रचे भी हैं | पर यहाँ की सवर्ण जातियों के अधिकतर लोगों ने बड़ी बेशर्मी के साथ, पानी पर अपना कब्जा ही नहीं जमाया बल्कि गरीब,मेहनतकश लोगों को अपने कब्जे के पानी को छूने भी नहीं दिया है | ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जब हैंडपम्प से पानी पी लेने पर बच्चों तक को पीट-पीट कर घायल कर दिया गया है | नई पाठ्य-पुस्तकें इस मुद्दे को नजरअंदाज कर देती है और पाठों से बाहर कर देती है |

'पर्यावरण अध्ययन' के लिए, एक और महत्वपूर्ण घटक है-'अनमोल जल'|कक्षा तीन की पाठ्य-पुस्तकों में, एन.सी..आर.टी.की पुस्तक में इस घटक से जुड़े तीन पाठ हैं | एस.आई..आर.टी.की पिछले वर्ष चल रही किताब में दो पाठ और इस वर्ष के लिए बनाई गई, नई पुस्तक में भी दो पाठ है |
  1. एन.सी.ई.आर.टी.कक्षा तीन की पुस्तक के तीनों पाठों में, विभिन्न प्रकार की गतिविधियों, रिफ्लेक्ट करने के लिए दिए गए प्रश्नों, चित्रों,आदि के माध्यम से बच्चों को पानी के सही इस्तेमाल के प्रति  सचेत किया गाया है | ‘क्या ऐसे भी कुछ लोग हैं, जिन्हें वहां से पानी नहीं भरने दिया जाता ?’ इस प्रकार के प्रश्नों के माध्यम से अध्यापकों को यह कहा गया है कि वें इस प्रश्न के माध्यम से बच्चों के बीच चर्चा आयोजित करें ताकि भेदभाव जैसे विषयों के प्रति बच्चों की संवेदनशीलता बढे |
  2. पिछले वर्ष चल रही एस.आई.ई.आर.टी की पुस्तक में भी एन.सी.ई.आर.टी.के तरीकों के जैसे ही प्रयास किए गए हैं | इन दो पाठों में भी बच्चों को पानी व पानी से जुड़े भेदभाव वाले मुद्दे पर भी बच्चों में  संवेदनशीलता बढाने के प्रयास किए गए हैं |
  3. एस.आई.ई.आर.टी.की नई पुस्तक में जानकारियों व उपदेशों के माध्यम से बच्चों को पानी के सही उपयोग के प्रति तो संवेदनशील बनाने की कोशिश की गई है पर भेदभाव वाले मुद्दे पर यह पुस्तक चुप रहती है |
यह समझ नहीं आता कि नई पुस्तक के लेखकों ने क्यों इस मुद्दे को बाहर निकाल दिया है ? क्या वे नहीं चाहते कि इस मुद्दे पर बच्चे संवेदनशील हों ? या वे इस तरह के भेदभावों को बनाएं रखना चाहते हैं ?  
- कमल 

Friday, 10 June 2016

कक्षा तीन की नई पुस्तक के, खेलों वाले पाठ से लड़कियां बाहर कर दी गई हैं.......

हम चाहते हैं कि हमारे पडौसी देशों से भी हमारे सम्बन्ध मजबूत हो | सभी यह मानते हैं कि खेल हमारे बीच प्रेम के भावों को  बढाते हैं | खेलों से सहयोग की भावना का विकास होता है | इन सिद्धांतों को ध्यान में रखकर, मोहल्लों,बस्तियों, विद्यालयों और देशों के खिलाड़ियों के लिए, खेलों का आयोजना किया जाता रहा है | पर राजस्थान की नई पाठ्यपुस्तकों में सिर्फ लडके ही खेल रहे हैं | खेल रहे लड़कों में ऐसे बच्चे भी गायब हैं जो ऐसे परिवारों से आते हैं जो कि हिन्दू धर्म को नहीं मानते किसी और धर्म को मानते हैं




 
क्या कहें इसको, पुस्तक लिखने वालों की लापरवाही या जेंडर असंवेदनशीलता ? क्योंकि तुलनात्मक अध्ययन के लिए चुनी गई तीनों पुस्तकों के पाठों का अध्ययन करने के बाद स्पष्ट रूप में दिखता है कि एन.सी..आर.टी.व एस.आई. ई.आर.टी.की पुरानी पुस्तकों में तो जेंडर संवेदनशीलता का ध्यान ही नहीं रखा गया है बल्कि यह कोशिश के गई है कि खेलों को लडके या लड़कयों के नाम से अलग-अलग ना बांटा जाएं | दोनों पुस्तकों के सभी चित्रों में बराबर की भागीदारी के साथ लडके और लड़कियां दोनों साथ खेल रहे हैं | जबकि नई पुस्तक के पाठ 3 के कुल चार चित्रों में से केवल एक चित्र में एक लड़की नजर आती हैं | और पाठ्य सामग्री में भी खेल रहे बच्चों में केवल एक लड़की का नाम आता है | शेष चारों चित्रों में केवल लडके ही खेल रहे हैं | जो भी प्रश्न पूछे गए हैं वो भी केवल लड़कों को ही मुखातिब हैं |
1.एन.सी.ई.आर.टी.की पुस्तक के पाठ 16 'खेल खेल में' के पहले ही चित्र में, सामान्यत: जो खेल लड़कियां खेलती है ( पेल-दूल ) उस खेल को दो लड़कियां व एक लड़का खेल रहे हैं | एक चाची इन्हें देख रही है | पाठ आगे बढ़ता है और चाची से रहा नहीं जाता | चाची भी बच्चों के साथ खेलती है | अचानक से बारिश हो जाती है तो चाची सभी को अपने घर में ले जाती है | वहां चाचा और भुआ शतरंज खेल रहे हैं | अब चाची के घर में सभी बच्चे अपने-अपने पसंद के खेल खेल रहे हैं | बहुत ही खूबसूरती से इस पाठ को बुना गया है | यह पाठ कई पुरानी परम्म्पराओं को तोड़ने का प्रयास करता है |
2. 2015-16 में राजस्थान के विद्यालयों में चल रही एस.आई..आर.टी.की पुस्तक के पाठ 7 'आलो खेलें खेल' में भी सभी चित्रों में लडके और लडकियां दोनों की भागीदारी नजर आ रही है | पाठ्य-सामग्री में यह भी समझ आता है कि केवल एक ही धर्म को मानने वाले परिवारों के बच्चे ही नहीं खेल रहे हैं |
3. इस वर्ष में चलने वाली ( शायद अब ना चल पाए ) एस.आई..आर.टी की नई पुस्तक के पाठ 3 'खेल खेल में' के चारों चित्रों में से केवल एक चित्र में एक लड़की की पीठ नजर आती है, शेष सभी लडके ही खेल रहे हैं | पाठ में जो बच्चे खेल रहे हैं उनके नाम हैं-रमेश,राम,थानाराम,ऋतु,भूपेश,कमलेश और बाबूलाल |   

- कमल 

पर्यावरण अध्ययन, कक्षा- 5

पाठ- 14 खाने से पचने तक 
पाठ के शुरू में भोजन को ठीक से चबाने पर ज़्यादा ज़ोर है जबकि शीर्षक पर आधारित अवधारणा (मुंह से मल त्याग तक) को संक्षेप में 4 लाइन में पेज 70 पर दे दिया गया है। भोजन के घटकों पर कोई चर्चा किए बिना ग्लूकोस को तुरंत ऊर्जा के लिए ज़रूरी बता दिया गया है, इसी क्रम में आगे स्कूल में दी जाने वाली आइरन की गोली खाने की आवश्यकता बताई गयी है और पाठ के अंत में कृमि नियंत्रण के लिए दी जाने वाली गोली खाने का संदेश है।

खास बात यह है कि इस पाठ में पेज 73 पर एक खाद्य पिरामिड दिया गया है जो किस आधार पर बनाया गया है, यह विवाद का विषय है। भोजन में क्या, कितना खाएं बताते हुए प्रोटीन के स्रोत- दूध, दही, छाछ (जो आसानी से उपलब्ध होता है और स्वयं मुख्यमंत्री सरस के विज्ञापन में रोजाना 2 ग्लास दूध पीने को कहती हैं), मछली और मांस का सीमित इस्तेमाल सुझाया गया है। सर्वाधिक इस्तेमाल में अनाज और दालें दिया गया है। उच्च क्वालिटी प्रोटीन के सस्ते, सुलभ और अच्छे स्रोत अंडे का इस पिरामिड में कोई ज़िक्र तक नहीं है। सर्वाधिकखूब, सीमित और कम मात्र बोलने के आधार क्या हैं और अनुपात क्या हैं, जब तक ये स्पष्ट न हों, इस पिरामिड को लेकर बच्चे के मन में misconception बनने की पूरी संभावना है।




एक ग्यारह साल के बच्चे को भोजन में सभी अवयवों (कार्बोहायड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज, जल और रेशेदार चीज़ें) की एक संतुलित मात्रा की ज़रूरत होती है, और बिना मात्रा बताए उसे इस तरह के पिरामिड के माध्यम से सीमित या कम खाएं जैसी बात कहना आपत्तिजनक है। 

इंटरनेट पर ऐसे कई चित्र हैं खास कर अमरीकी एजेन्सि यूएसडीए द्वारा प्रस्तावित पिरामिड लेकिन उनमें भी हर किस्म के भोजन की सर्विंग्स की संख्या दर्शाई गयी होती हैंऔर वो भी वयस्कों की आवश्यकता के आधार पर, बच्चों के लिए कहीं ऐसा चार्ट नहीं दिखता। 


इस तरह यह पाठ बहुत उपदेशात्मक हैखोजने/ तर्क ढूँढने/ ज्ञान निर्माण के मौके देने के बजाय बच्चों को सूचनाओं को रटने/ जैसा है वैसा ही मान लेने पर अधिक ज़ोर देता है और अफसोस ये कि सूचनाएँ भी तोड़ मरोड़ के पेश की गयी हैं। 

Thursday, 9 June 2016

समाजिक विज्ञान, कक्षा-8



सामाजिक विज्ञान की पुस्तक-2015 व 2016 दोनों पुस्तकों का अध्ययन व समीक्षा करने पर उभरे कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दू:-


  • दोनों पुस्तकों का अवलोकन करने पर पाया कि पूर्व में (2015 की ) कक्षा-8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के मुखपृष्ठ पर महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस व भगत सिंह के चित्र अंकित थे वहीं 2016 की पुस्तक के मुखपृष्ठ से सुभाषचन्द्र बोस व भगत सिंह के चित्र हटा दिये गये। 
  • 2015 की पुस्तक के मुखपृष्ठ के पीछे वाले पृष्ठ पर बेटी बचाओं बेटी पढाओ के संदेश के साथ लिंग निर्धारण व कन्या भ्रुण हत्या की रोकथाम हेतु बने पी.सी. एण्ड पी.एन.डी.टी. एक्ट 1994 का सशक्त संदेश जन-जन तक पहुंचाने की दृष्टि से पुरा पेज दिया गया है वहींं 2016 में जारी पुस्तक के इस पृष्ठ पर इसे हटा दिया गया। अच्छा होता यदि परिर्वतन ही करना था तो और नये बने कानून जैसे पोकसो (Pocso) की जानकारी दी जानी चाहिए थी। 
  • 2016 की पुस्तक के प्राक्‍कथन में संवैधानिक मूल्य कह कर छोड दिया गया, संवैधानिक मूल्य जैसे जैण्डर, धर्म, जाति, भाषा, जन्म स्थान विविधता व विशेष आवश्‍यकता वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता रखने जैसे वाक्यों को हटा दिया गया। 
  • 2016 की पुस्तक में अध्याय सूची में हमारा भारत, हमारे मौलिक अधिकार शीर्षक के माध्यम से संकीर्ण व संकुुचित मानसिकता का परिचय दिया गया है जबकि भारत का संविधान, नागरिकों के मौलिक अधिकार तो सबके लिए हैंं और व्यापक हैंं। इनके साथ हमारा-तुम्हारा या उनका जोड़़ने की आवश्‍यकता नहीं प्रतीत होती है। 
  • 2016 की सामाजिक विज्ञान कक्षा 8 की पुस्तक में दिये गये नक्षों (Maps) व पुस्तक के पन्नों के चारों ओर की किनारों पर इतने गहरे रंगो का इस्तेमाल किया गया है कि बच्चे आसानी से नहीं पढ़ सकते है। 
  • पेज 3 पर स्पष्ट किया जाना चाहिए कि भारत के 28 राज्य व 9 केन्द्र प्रशासित प्रदेश थे 2 जून 2014 को आन्ध्रप्रदेश के विभाजन के बाद तेलंगाना को 29 वाँँ राज्य बनाया गया। अब कुल 29 राज्य व 7 केन्द्र प्रशासित प्रदेश हैंं। 
  • पेज 58 पर बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं के अन्तर्गत लिंगानुपात दर्शाते हुये बाल लिंगानुपात को स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाया गया। पेज 77 पर जहाँँ गिरता लिगांनुपात लिखा गया वहाँँ पर भी बाल-लिंगानुपात का आंकडा नहीं दर्शाया गया जबकि बाल-लिंगानुपात ही निरन्तर घटता रहा है न कि लिंगानुपात। लिंगानुपात पिछली तीन जनगणनाओं में बढा हुआ आ रहा है। 
  • पेज 59 पर शादियों के लिए बेटियों की कमी लिखना तथा उसे मात्र बेटी, मां, पत्नि के रूप में देखना लैगिंक भेद-भाव को बढ़ावा देता है। एक बेटी को शादी व उसे मां एवं पत्नी के रूप से हटा कर एक नागरिक के रूप में देखना चाहिए। बेटियों का जीवन केवल शादी के लिए ही नहीं अपितुु सभी क्षेत्रों में उनकी भूमिका को दर्शाया जाना चाहिए। ताकि सामाजिक सन्तुलन की ओर बच्चों का ध्यान आकर्षित किया जा सकें। 
  • पेज 91 पर प्रथम राष्ट्रपति के रूप में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का नाम दर्शाया गया लेकिन प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू का नाम दर्शाने से परहेज किया गया। बच्चों को प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू की जानकारी क्यों नहीं देना चाहते हैंं जबकि 2015 की पुस्तक में इनका नाम दर्शाया गया है। 
  • पेज 144 पर स्वतन्त्रता पूर्व विभिन्न शासकों द्वारा बनाये गये कानूनों को बताया गया लेकिन स्वतन्त्र भारत में बने कानूनों का जिक्र तक नहीं किया गया। यहाँँ तक कि 2015 की पुस्तक में सूचना का अधिकार कानून की जानकारी दी गई उसे भी 2016 की पुस्तक में हटा दिया गया। जबकि कुछ महत्त्वपूर्ण प्रगतिशील कानूनों के नाम बताये जाने चाहिए। जैसे सूचना का अधिकार कानून, पी.सी. एण्ड पी.एन.डी.टी. एक्ट, घरेलू हिंसा से महिला का संरक्षण अधिनियम 2005, बच्चों का यौन शोषण से संरक्षण अधिनियम, 2012, खाध सुरक्षा कानून, रोजगार गारण्टी कानून आदि। 


इस पुस्तक के अध्ययन, विश्‍लेषण व समीक्षा के आधार पर कहा जा सकता है कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर रखने, तथ्यों से अवगत नहीं कराने जैसी सकीर्ण व सकुचित तथा सामन्ती व पितृसतात्मक मानसिकता व विचारधारा बच्चों को क्यों परोसी जानी चाहिए ? क्यों नहीं व्यापक दायरे में मानवाअधिकार व मौलिक अधिकार तथा लैगिक संवेदनशीलता पर आधारित पाठयक्रम हो।

कक्षा की 8 की सामजिक विज्ञान 2016  की पुस्तक को सरसरी निगाह से देखने व कम समय में की गई समीक्षा मात्र से उभरे कुछ बिन्दुु ही यहाँँ  दिये गये हैंं। यदि और भी गहन अध्ययन किया जाए तो बहुत सी त्रुटियाँँ व भ्रामक सामग्री मिलेगी जो बच्चों को गलत सूचनाएँँ पहुँचाएगींं । इन्‍हें पढ़ने वाले बच्चे बड़े होकर सामन्य ज्ञान व अन्य परीक्षाओं में सफल होने योग्य नहीं बन पाएँँगे।

अतः तुरन्त प्रभाव से इस तरह की पुस्तक को रोका जाना चाहिए।

डॉ. लाडकुमारी जैन
प्रो. (से.) राजनिति विज्ञान
एवं पूर्व अध्यक्ष राज्य महिला आयोग