Thursday, 9 June 2016

35 करोड़ रुपयों की पुस्तकों को रद्दी बनाकर, राज.सरकार द्वारा 40 करोड़ रुपयों में नई पुस्तकें छापी गई हैं | इन नई पुस्तकों के हर पन्ने पर खराब गुणवत्ता वाले चित्र हैं व हर पाठ में जानकारियों व उपदेशों का अम्बार लगा दिया गया है,...........

नई पाठ्य-पुस्तकों में 'पर्यावरण अध्ययन' को सात घटकों में रखा गया है | पहला घटक है 'हमारा परिवेश एवं संस्कृति' इस घटक के आधार पर एन.सी..आर.टी.की पुस्तकों में कुल दस पाठ है | एस.आई..आर.टी.की पुरानी पुस्तकों में छ: पाठ है व नई पुस्तकों में 8 पाठ हैं | आज इन सभी पाठों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है | इन नई पुस्तकों को देखकर लगता है कि राजस्थान के विद्यालयों में चलने वाला शिक्षण कर्म, एन.सी.एफ.2005 के सिद्धांतों के खिलाफ फिर से पुरानी शिक्षण पद्दतियों की ओर लौट रहा है | जानकारियों को थोपने वाले जिन शिक्षण तरीकों का पुरजोर विरोध किया गया था, यह नई पुस्तकें फिर से उन्ही तरीकों की ओर लौटती है | जैसे कि:-
1.'हमारा परिवेश व संस्कृति' घटक के तहत एन.सी..आर.टी.की कक्षा तीन की पुस्तक में कुल 10 पाठ है | इन पाठों में 83 सुन्दर, स्पष्ट व आकर्षक चित्र हैं जो बच्चों को ज्ञान निर्माण में सपोर्ट करते हैं | 57 गतिविधियाँ हैं जो बच्चों को अपने ज्ञान को परिष्कृत करने के लिए छोटी-छोटी चुनौतियां देती हैं |72 प्रश्न  हैं जिनमें बच्चों को सोचने, रिफ्लेक्ट करने व कल्पना करने के मौके मिलते हैं | लगभग सभी पाठ बच्चों से संवाद करते चलते हैं और बच्चों को ज्ञान निर्माण के मौके उपलब्ध कराए जाते हैं |
2. इसी घटक के तहत, पिछले वर्ष चल रही कक्षा तीन की पुस्तक में कुल 6 पाठ है | इन पाठों में भी एन.सी..आर.टी.की पुस्तकों जैसे तो नहीं पर फिर भी ठीक-ठाक चित्र हैं जो बच्चों को आकर्षित करते हैं | 29 गतिविधियाँ दी गई हैं | इन गतिविधियों में बच्चों को अन्वेषण करने व अवलोकन करने, आदि विश्लेषण कौशल को विकसित करने के मौके बच्चों को मिलते हैं | 56 प्रश्न हैं जो बच्चों को रिफ्लेक्ट करने के मौके उपलब्ध कराते हैं |
3. एस.आई..आर.टी.की सत्र 2016-17 के लिए बनाई गई कक्षा तीन की नई पाठ्य-पुस्तक के आठ पाठों में कुल 45 ही चित्र हैं जिनमें 35 बहुत खराब गुणवत्ता वाले चित्र हैं | इन चित्रों को देखकर, बच्चों की पाठ में रूचि पैदा होने के बदले, अरुचि होना अधिक संभव है | गतिविधियाँ सिर्फ 11 दी गई हैं | सवाल वैसे तो पर्याप्त संख्या में हैं ( कुल 95 सवाल ) पर अधिकतर सवाल जानकारी वाले हैं जिन का उत्तर पाठ को याद करके दिया जा सकता है | इन प्रश्नों में बच्चों के सोचने के मौके बहुत कम दिए गए हैं |
- कमल 


Wednesday, 8 June 2016

क्यों मेहनत की जाए, दलितों के,अल्पसंख्यकों के और गरीबों के बच्चे हैं, कुछ भी पढ़ा दो.......

इस वर्ष यूनिसेफ राजस्थान के वित्तीय सहयोग से, एस.आई..आर.टी.उदयपुर द्वारा नई पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण किया गया है | पिछले वर्ष ही नई पा.पुस्तकें बनकर तैयार हुई थीं और इस वर्ष फिर से नई पुस्तकों का निर्माण कर दिया गया है | सुना है कि यह पुस्तकें लगभग 45 दिनों में ही तैयार कर दी गई हैं | बड़ा आश्चर्य हुआ यह सुनकर, क्योंकि सामान्यत: बड़ी मेहनत के बाद भी लगभग छ: माह का समय, पुस्तकें तैयार होने में लगता है |
'पर्यावरण अध्ययन’ शिक्षण में, मेरी रूचि रही है | पिछले कुछ वर्षों से, मैं लगातार छोटे बच्चों के साथ अध्यापन से जुडा रहा हूँ | मेरी भी जिज्ञासा थी कि मैं इन पुस्तकों का अध्ययन करू | बड़ी मुश्किल से पुस्तकें उपलब्ध हो पाई हैं |
नई पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण इतनी जल्दबाजी में क्यों किया गया ? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए , 'पर्यावरण अध्ययन' कक्षा तीन की नई पुस्तक के प्राक्कथन को पढ़ा | पहले ही पैराग्राफ में लिखा है - 'बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षा में परिवर्तन होना जरुरी है, तभी विकास की गति तेज होती है' इसी पैराग्राफ के अंत में लिखा है - 'पाठ्यचर्या को सही रूप में पहुंचाने के लिए पाठ्यपुस्तक महत्वपूर्ण साधन है | अत: बदलती पाठ्यचर्या के अनुरूप ही पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन कर राज्य सरकार द्वारा नवीन पाठ्यपुस्तक तैयार कराई गई है ' |
क्योंकि प्राक्कथन में ही यह भी लिखा गया है कि वर्तमान में एन.सी.एफ.2005 व आर.टी..2009 के द्वारा यह स्पष्ट है कि समस्त शिक्षण क्रियाओं में विद्यार्थी केंद्र में है, तो लगा कि बच्चे को केंद्र में रख कर बनाई गई अन्य पुस्तकों का अध्ययन भी करना चाहिए | मैने एन.सी..आर.टी.द्वारा बनाई गई व पिछले वर्ष में चल रही एस.आई..आर.टी.द्वारा बनाई गई पाठ्य  पुस्तकों के साथ नई पाठ्य-पुस्तकों का अध्ययन करना शुरू किया है |
तीनों पुस्तकों के पहले पाठों का तुलनात्मक अध्ययन किया तो लगा कि नई पुस्तकों को इतनी जल्दबाजी में बानाने का नतीजा यह हुआ है कि अध्ययन की गति तेज होने के बदले अवरुद्ध कर दी गई है | पर्यावरण अध्ययन में 'अध्ययन' की प्रक्रिया में बच्चों को शामिल किया जाता है | यह कोशिश भी प्रभावी तरीकों से की जाती है कि बच्चों में अध्ययन कौशलों का विकास हो | नई पुस्तक के पहले पाठ में बार-बार पुस्तक लेखकों द्वारा मतारोपण किया गया है उपदेश देने की जल्दबाजी में पाठ बच्चों के लिए बोझिल हो गए हैं | जैसे कि:-
1. एन.सी..आर.टी.द्वारा बनाई गई 'आस-पास' कक्षा तीन की पुस्तक के पहले पाठ 'डाल-डाल पर,ताल-ताल पर' पाठ में, एक लड़की को केंद्र में रख कर इस प्रकार से बुना गाया है कि बच्चों को बार-बार पाठ में अवलोकन करने का मौका मिलता है, व सोचने के अवसर मिलते हैं | विश्लेषण कौशलों को बढाने के लिए सरलता से कठिन की ओर बढ़ा गया है | जैसे कि पहले सूचियाँ बनाना फिर समूहीकरण करना,आदि | पहले ही पाठ में कुछ रचनात्मक कला कार्य करने का मौका भी बच्चों को दो बार मिलता है | ऐसी कोशिशे भी की गई है कि बच्चों का भाषा और अधिक समृद्ध हो पाए |
2.एस.आई..आर.टी.द्वारा पिछले वर्ष में चल रही, पाठ्य-पुस्तक 'मेरी दुनिया' के पहले पाठ 'बरसो रे बदरा' में सीधे निर्देश देते हुए बच्चों को अध्ययन की प्रक्रिया में डालने का थोड़ा प्रयास नजर आता है | दो बार बच्चों से अवलोकन करने की अपेक्षा भी की गई है | बच्चों को थोड़ा सोचने व निर्णय लेनी का मौका भी मिलता है | भाषा विकास के प्रयास व थोड़ा क्राफ्ट का काम बच्चों से कराने के प्रयास भी इस पाठ में देखे जा सकते हैं |
3.एस.आई..आर.टी. द्वारा आने वाले सत्र के लिए तैयार की गई नई पाठ्य पुस्तक 'अपना परिवेश' के पहले पाठ 'रिश्ते-नाते' में बच्चों को अध्ययन की प्रक्रिया में डालने के बदले सीधे-सीधे जानकारियाँ देने की कोशिश ही नहीं नहीं की गई है, अभिवादन की एक ही प्रकार की शैली का मतारोपण भी किया गया है | पाठ में इस जानकारी को स्थापित करने की कोशिश है कि गाँवों में बड़े परिवार होते हैं व शहरों में छोटे परिवार होते हैं | बार-बार यह जिक्र है कि बड़ों को प्रणाम करना चाहिए,आदि-आदि | विश्लेषण कौशल को बढाने के प्रयास में जल्दबाजी के चक्कर में तीन बार बच्चों से कुछ सामान्य जानकारियों को सारणी में भरवाने की अपेक्षा की गई है | अन्य दोनों पुस्तकों के पहले पाठों में, बच्चों को करने के लिए कुछ रोचक गतिविधियाँ सुझाई गई है पर इस पाठ में एक भी गतिविधि नहीं है |
नई पाठ्य पुस्तक के पहले पाठ का अध्ययन करने के बाद लगा कि इन पुस्तकों को बहुत जल्दबाजी में ही नहीं, बच्चों के प्रति असंवेदनशील नजरिए से भी इन पुस्तकों को तैयार किया गया है | शायद यह सोचकर कि गरीबों के बच्चे हैं क्या फर्क पड़ता है | हमारे राजस्थान में अगले वर्ष से केन्द्रीय विद्यालयों के बच्चे तो अच्छी व प्रभावी पुस्तकों से अध्ययन करेंगे व सामन्य प्राथमिक स्कूलों के बच्चे जानकारियों के अम्बार के नीचे दबे-दबे से, किसी तरह से कक्षा दर कक्षा आगे बढ़ते रहेंगे,शिक्षित होने के भ्रम के साथ |  

                                                                    कमल 

पर्यावरण अध्ययन की पुस्तको के बारे में

वर्तमान में SIERT द्वारा प्रकाशित राजस्थान की नई पाठ्यपुस्तको में जब हमने पर्यावरण अध्ययन की पुस्तको को देखा तो उसमें शुरुआत में शिक्षको के लिए लिखा गया है कि शिक्षक बच्चों के साथ बातचीत करते हुये जेण्डर संवेदनशीलता का ध्यान अवश्‍य रखें।

लेकिन जब पुस्तको को देखा तो स्वयं पुस्तक तैयार करने वालों ने ही इस बात का ध्यान नहीं रखा। जिसके काफी उदाहरण इस प्रकार से हैं -
  1. अधिकतर चित्रो में महिलाएँ ही पानी भरने जा रही है , कुएँ से पानी खींच रही हैं  ,हैण्डपम्प से पानी खींच रही है ,कपडे धो रही हैं ,खाना बना रही हैं बर्तन धो रही हैं। पुरुषों को अधिकतर पानी के साथ इस प्रकार के काम करते दिखाया गया है जैसे : नहाना , दाँत साफ करना  पानी पीना। (कक्षा 3 की पुस्तक में पृष्‍ठ 55)
  2.   पुस्तक में दिये गये चित्रों में भी स्‍पष्‍टता नजर नहीं आती है : कक्षा 3 की पुस्तक में पृष्‍ठ 53 पर एक चित्र दिया गया है दूर-दूर से पानी लाते लोग लेकिन चित्र इस बात को नहीं कह पा रहा है कि लोग पानी दूर से ला रहे हैं या नजदीक से ला रहे हैं।
  3. कक्षा 3 मे ही भोजन सम्बन्धी अच्छी आदतें पाठ में रानी का परिवार जहाँ खाना खा रहा है उसमें एक मुख्य कुर्सी पर दादाजी बैठे हुये हैं। मां, बेटी एक तरफ व बेटा, पिता एक तरफ बैठे हैं।
  4. खाना तैयार करने में रानी की माँ व रानी व्यवस्त हैं, भाई राजू बाहर खेलने गया है। रानी के पिता के आने पर ही खाना खाया गया है ।
  5. हिन्दूत्व विचार धारा को जोर-शोर से उभारा गया है । जैसे ‘नमामि गंगे प्रोजैक्ट’, (कक्षा 4 की पुस्‍तक में पृष्‍ठ 58)। पहली नज़र में यह भारत सरकार के गंगा संरक्षण के एक कार्यक्रम की जानकारी मात्र लगती है किन्‍तु किताब में जिस तरह  पानी को अधिकतर पवित्रता (हिन्‍दु पवित्रता बोध) के साथ दिखाया गया है उस रोशनी में इसे देखें तो इसमें समस्‍या नज़र आती है। अच्छे काम से पुण्य मिलता है। इस प्रकार की मिथ बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करने में बाधा उत्पन्न करते हैं । महात्माओं का काफी बोलबाला रहा है। किताबो में आये अधिकतर नाम हिन्दू नाम हैं।
  6. बच्चों को स्वयं करके देखने के अवसर बहुत कम हैं।
  7. प्रत्येक पाठ में दिया गया है कि शिक्षक इन पर चर्चा करे। लेकिन बच्चों को स्वयं पढ़ने के लिए बहुत कुछ नहीं है जिससे की वे चर्चा में भाग ले सकें।


प्रस्‍तुतकर्ता – दिगंतर शिक्षक समूह


नोट : यह विश्‍लेषण दिगंतर शिक्षकों के समूह द्वारा ग्रीष्‍मकालीन कार्यशाला के दौरान किया गया है 

Tuesday, 7 June 2016

बराबर बंटवारा (कक्षा 2 - अध्‍याय 9)

जितनी बार आप नई किताबों को देखते हैं उतनी ही बार आप अपने सर के बालों को नोच सकते हैं, खतरा सिर्फ इतना है कि आपकी खोपड़ी गंजी हो जाएगी लेकिन इन किताबों में गलतियां खत्‍म होने का नाम न लेंगी। इसलिए बेहतर है इन किताबों को पढ़ते वक्‍त अपने हाथों को खुद के सिर से दो हाथ दूर ही रखें।


कक्षा 2 में 9 पन्‍नों का पाठ बराबर बंटवारा के नाम से बनाया गया है। लेखकगणों ने इस नाम का संधि विच्‍छेद किया और पाठ के पन्‍नों का गैर बराबर बंटवारा करके पहले दो पन्‍ने बराबर की अवधारणा के अभ्‍यास में होम कर दिए। यह बात ठीक है कि बराबर की अवधारणा पर काम किया जाना जरूरी है लेकिन वह काम तो जोड़ घटाव तथा गुणा से पहले कर लिया जाना चाहिए। उस काम को इतनी देर बाद करने का कोई तुक नहीं बनती। और फिर भाग के संदर्भ में बराबर का इस्‍तेमाल बंटवारा करने के संदर्भ में किया जाता है यानी ऐसा बंटवारा जो बराबर हो, अकेले बराबर का भाग के लिहाज से कोई मतलब नहीं बनता।

आपको यह भी लग सकता है कि लेखकों का एक मकसद बच्‍चों को निर्देश पढ़ कर समझने में काबिल बनने की काबिलियत का विकास करने की राह में रोड़े  अटकाना है इसलिए वे ऐसी भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं जिसे पढ़ कर या सुन का समझना मुश्किल हो। जैसे,

‘’नीचे दी गई तालिका 1 व 2 में चित्रों को देखिए गिनिए एवं बराबर से बराबर को मिलाइए’’
‘’नीचे तालिका में माला एवं खुले मोतियों को गिनिए सामने वाली तालिका से बराबर अंकों से मिलान कीजिए’’


पहले निर्देश में चित्रों को बराबर से जानबूझ कर दूर रखा गया है ताकि बराबर शब्‍द को सुनते वक्‍त बच्‍चों के दिमाग में उसका कोई मतलब न बन पाए। एक ही वाक्‍य में तीन निर्देश ठूंस दिए गए हैं। दूसरे निर्देश में गिनवा कर, बराबर अंकों से मिलान करने को कहा है। ये बराबर चीजें तो आपने सुनी होगी लेकिन ये बराबर अंक क्‍या होता है भई, इसे आप तलाश करते रहिए। दोनों वाक्‍यों की बुनावट तो आप देख ही रहे होंगे कि कैसी है। आप अफसोस ही जाहिर कर सकते हैं कि इन किताबों के लेखकों के लिए लिए एक वाक्‍य के निर्देश भी ठीक से लिख पाना इतना मुश्किल क्‍यों है, उन्‍होंने तो इसे लिख कर छोड़ दिया आखिरकार, इसे भुगतना तो बच्‍चों को ही है। 

अब हम अवधारणा सिखाने के तरीके पर आते हैं। पेज क्रमांक 63 पर बराबर बांट कर भाग करना सिखाने के लिए कार्टून विधि का इस्‍तेमाल किया गया है जिसमें अध्‍यापिका व बच्‍चों के चेहरे के चित्र तथा उनकी कही गई बातों को बुलबुलों में दिखाया गया है। अवधारणा का परिचय देने में तीन पन्‍नों की पर्याप्‍त जगह इस्‍तेमाल की गई है। आप खुश हो सकते हैं कि पहाड़े की मदद से भाग करने वाले पुराने तरीके से शुरूआत करने के बजाए ऐसा तरीका लिया गया है जिसमें बच्‍चों की रूचि भी हो और वे उसमें कुछ काम साथ साथ करके समझ भी पाएं। लेकिन पन्‍ने को देखने के बाद मिली खुशी, उसे पढ़ना शुरू करते ही काफूर होने लगती है।

भाग को सिखाने की शुरूआत में अध्‍यापिका अपने सामने पांच थालियां रख कर व उनमें तीन तीन लड्डू रख कर पूछती है – ‘’5 थालियां जिसमें 3-3 लड्डू हैं, तो बताइए कुल कितने लड्डू हैं।‘’ हरेक थाली के नीचे एक बच्‍चे का नाम लिखा है। एक लड़का गिन कर बताता है, -‘’बहन जी! 15 लड्डू हुए। एक लड़की बोलती है, ‘’सभी में बराबर बराबर तीन लड्डू हैं।‘’

अब आप अपने सर से दो तीन बाल नोचने से खुद को नहीं रोक सकते। अपने गुस्‍से पर थोड़ा काबू रखिए, अभी तो इसकी शुरूआत ही हुई है। इस पाठ का मकसद, बराबर बांट कर भाग सिखाना है या गुणा। अगर इस पाठ का मकसद बराबर बंटवारे की मदद से भाग सिखाना है तो शुरूआत गुणा व भाग के संबंधों से क्‍यों की जा रही है। मेरा ऐसा अनुमान है कि लेखकों ने संभवत: कहीं एक अच्‍छे विचार को सुना-पढ़ा होगा कि किसी भी नई अवधारणा को सिखाने से पहले उसे पूर्व ज्ञान से जोड़ना चाहिए। इस अच्‍छे विचार का एक सबूत वे आरंभ में बंटवारे से तोड़ कर बराबर की अवधारणा को सिखा कर दे चुके हैं। उससे भी उन्‍हें चैन नहीं पड़ा तो यहां उन्‍होंने यह सोच कर गुणा को ले लिया है कि चूंकि गुणा भाग से पहले सिखाया जाता है और दोनों का आपस में संबंध तो होता ही है इसलिए उसे भाग से पहले एक बार तरोजाता कर ही लेना चाहिए।

यह बात सही है कि गुणा व भाग का आपस में उलट संबंध है। लेकिन क्‍या इस संबंध का इस्‍तेमाल भाग सिखाने की शुरूआत में किया जाना चाहिए। क्‍या यह संबंध गुणा व भाग की समझ की बुनियाद बनने के बाद समझना आसान नहीं होता। क्‍या आप घटाव सिखाने की शुरूआत करते वक्‍त उसे जोड़ से उलट संबंध के तौर पर सिखाना आरंभ करते हैं। या घटाना अच्‍छी तरह से सिखाने के बाद जोड़ व घटाव, दोनों के संबंधों को सिखाते हैं। खैर इस पाठ में यह कोई पहली और आखरी समस्‍या तो है नहीं।

किताब में दी गई अब तक की बातचीत में किसी बच्‍चे का नाम नहीं लिया गया है ना ही पहले पन्‍ने के आखिर तक किसी का नाम लिया जाता है तो यह समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि थाली के नीचे बच्‍चों के नाम क्‍यों लिख दिए गए होंगे। इसी तरह लड़की द्वारा बोला गया वाक्‍य एक नकली वाक्‍य है और गैर जरूरी भी क्‍योंकि अध्‍यापिका ने तो यह बात पूछी ही नहीं। या तो आप यह बोलते हैं कि सभी में तीन तीन लड्डू हैं या फिर यह कि सभी में बराबर लड्डू है। वैसे भी गुणा का सवाल हल करने के बाद इस वाक्‍य को बोलने को कोई तुक नहीं। अगर आपकी निगाहें चित्र पर गई हों तो आप यह भी सोच सकते हैं कि क्‍या कोई थाली तीन लड्डुओं से पूरी भर जाती होगी।

अब अध्‍यापिका भाग सिखाने वाली बातचीत पर आती है। वह पूछती है, ‘’यदि इन्‍हीं लड्डुओं को तीन थालियों में बराबर बराबर भरना है तो कितने कितने लड्डू आएंगे ? लड़की जवाब देती है, बहन जी! तीनों में बराबर-बराबर 5-5 लड्डू आएंगे।‘’ आप देख सकते हैं कि यहां बराबर बंटवारे का दिखावा तो हुआ लेकिन बराबर बंटवारा हुआ ही नहीं।

इस पूरी बातचीत को समझने की कुंजी लड़की के जवाब में बोले गए बहन जी शब्‍द के बाद लगे विस्मयादिबोधक चिन्‍ह में है। इससे आपको यह सुराग मिलता है कि भाग के सवाल का जवाब किसी प्रक्रिया से नहीं बल्कि एक किस्‍म के इलहाम से मिलता है।

इस बातचीत को विस्‍तार से समझने की जरूरत है। पूरे पन्‍ने पर कहीं भी लड्डुओं का वह समूह नहीं है, जिसे बराबर बांटा जाना है। कहां है 15 लड्डुओं की ढेरी। या तो पहले सवाल में तीन तीन लड्डू की थाली का चित्र है या दूसरे सवाल में पांच पांच लड्डू की थाली का चित्र। आप खोजेंगे तो बड़ी मुश्किल से लड़के की बात में 15 का जिक्र मिल जाएगा और अध्‍यापिका के सवाल में उन लड्डुओं का संदर्भ मिल जाएगा लेकिन बगैर संख्‍या का नाम बोले। यानी लेखक गणों ने लड्डुओं को अदृश्‍य कर दिया है। कहीं उनहें यह डर तो नहीं सता रहा था कि आरंभ में 15 लड्डुओं के चित्र देने से बच्‍चे कहीं गलती से भी उन लड्डुओं की ढेरी को गिन कर उसका मतलब न समझ लें।

फिर भी, यह तो इस संवाद की आंरभिक अड़चन है। इस संवाद में सबसे बड़ी समस्‍या यह है कि पहले सवाल आता है और उसके बाद शब्‍दों में जवाब भी आ जाता है। तो इसमें किसी को क्‍या एतराज होना चाहिए। एतराज यह है कि इस पूरे तामझाम में भाग की संक्रि‍या तो होती कहीं भी नहीं दिख रही जिसे समझाने के लिए चित्र बनवाए गए व बातचीत के इतने पापड़ बेले गए थे। जवाब देने वाली लड़की को कैसे पता चला कि तीनों में बराबर लड्डू आएंगे। चित्र से कहीं यह पता नहीं चलता कि अध्‍यापिका के सवाल का जवाब निकालने के तीन खाली थालियां लेनी पड़ती है फिर उनमें अपने पास मौजूद उन अदृश्य लड्डुओं की कल्‍पना करनी पड़ती है व अंत में उनमें से एक एक को प्रकट करवा कर बांटना भी पड़ता है तब कहीं जाकर पता चलता है कि हरेक थाली में कितने कितने आएंगे और यह भी कि वे बराबर हैं या नहीं।

आप यह भी कह सकते हैं कि लड़की ने चित्र देख कर जवाब थोड़े ही दिया वह तो अध्‍यापिका की बात सुन कर जवाब दे रही है। तो सवाल उठ सकता है कि फिर थालियों में लड्डू दिखाने की जरूरत ही क्‍या थी। वैसे अगर चित्र देख कर वह जवाब देती तो यह कह सकती थी कि तीनों थालियों में 5 – 5 लड्डू हैं। लेकिन यहां पर एक नई मुश्किल यह भी है कि चित्र तो ऐसे हैं नहीं कि वह उन्‍हें देख कर व गिन कर बता पाए।

इस पन्‍ने से आप इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि भाग का सवाल हल करने के लिए किसी किस्‍म का कोई काम करने की जरूरत नहीं है। सवाल सुनते ही आपके दिमाग में जवाब आ जाता है। और नहीं आए तो जवाब का न समझ आने लायक फोटो देख कर तो कैसा भी जवाब हो, आ ही जाता है। 

इसी प्रगटीकरण या इलहाम की प्रक्रिया से अगले पन्‍ने पर दिए सवाल का जवाब चित्रित लड़के के दिमाग में रोशन हो जाता है।

इसके बाद लेखकों को लगा कि दो बार जवाबों का इलहाम करवाना तो काफी हो गया सो अब थोड़ा बहुत भाग की संक्रिया का दिखावा भी कर लिया जाए। चित्र बना कर किसी अवधारणा को सिखाना तो अच्‍छी बात मानी जाती है न। तो पेज क्रमांक 64 पर वे एक सवाल देते हैं जिसमें 12 गेंदों को 2 बच्चों में बांटना है। पन्‍ने की बची खुची जगह पर वे कांच की गोली के आकार की गेंदे बना कर उनके नीचे दो बच्‍चों के चित्र बना देते हैं। पहली छह गोलीनुमा गेंदों को पहले बच्‍चे तथा बाकी छह गोलीनुमा गेंदों को दूसरे बच्‍चे के सिर पर रखे गोले से जोड़ देते हैं। बच्‍चों को सिर्फ यह करना है कि छह गोलीनुमा गेंदों को गिने व उनसे जुड़े खाली गोले में लिख दें।

काम करवाया छह गेंदों को गिनवा कर लिखवाने का और दिखावा किया बराबर बांट कर भाग सिखाने का। अपने सिर के दो चार बाल और यह सोच कर नोच लीजिए कि दो पन्‍नों में लेखकों ने कितनी मेहनत की है छह गोलीनुमा गेंदों को गिनवाना सिखाने में। चलिए आपको याद दिला दूं कि 50 तक की संख्‍याएं तो बच्‍चा कक्षा 1 में ही गिनना सीख चुका होना चाहिए। आप थोड़ा चैन की सांस तो ले ही सकते है कि यहां तक आते आते बच्‍चे को कम से कम गिन कर लिखने के अभ्‍यास का मौका तो मिला। 

अब तक आपको यह समझ में आ ही गया होगा कि असली माजरा तो यह है कि लेखकगणों को चित्रों के जरिए बच्‍चों से बराबर बंटवारा करवा कर भाग सिखाना आता ही नहीं है। इसलिए वे कहीं भी सवाल को हल करने के लिए भाग की प्रक्रिया का इस्‍तेमाल नहीं करते। वे सवाल लेते हैं। उसका जवाब उन्‍हें पता है, इसलिए वे जादूगर की तरह अपनी दायीं या बायीं जेब से जवाब निकालते हैं और उसी जवाब को चित्र के जरिए दर्शा देते हैं और इस काम के जरिए उम्‍मीद यह करते हैं कि बच्‍चे भाग को बराबर बांटने की प्रक्रिया के तौर पर सीख जाएंगे। 

इसका सबूत अगले ही पेज क्रमांक 65 पर फिर से मिल जाता है, जब वे इन्‍हीं 12 गेंदों को(जो तस्‍वीर में गोली के आकार से बड़ी हो चुकी होती है) तीन बालकों में बंटवाने को चित्र में दर्शाते हैं। चित्र वाला बच्‍चा खुश होकर लेखकगणों की जेब से निकले जवाब को बोल देता है।

आप लेखकों की हिम्‍मत की दाद ही दे सकते हैं कि जो काम जिस तरीके से उन्‍हें तक करना नहीं आता, उसकी काम को करने के लिए वे तीसरे पन्‍ने पर बची खुची जगह का इस तरह इस्‍तेमाल करते हैं कि अगर कोई बच्‍चा खुद के बूते करना भी चाहे तो जगह की तंगी के चलते करने की सोच ही न सके। अफसोस यहां पर लेखकगणों की जेब से निकला जवाब मौजूद नहीं है। और भाग के सवाल का जवाब खोजने की प्रक्रिया लेखकों ने उसे इन तीन पन्‍नों में अब तक सिखाई ही नहीं। 

आप जैसे ही पेज क्रमांक 66 पर दिए गए अभ्‍यास पर आते हैं तो पहले ही सवाल से साफ हो जाता है कि लेखकों का मकसद तो पहाड़ों को बोल कर भाग करना सिखाना था। यहां पर भी दिखावे के लिए वस्‍तु, डिब्‍बों की संख्‍या तथा प्रत्‍येक में कितने कितने भरेंगे, यह पूछा गया है। लेकिन चूंकि किताब में चीजों की मदद से बराबर बांट कर हल करना सिखाया ही नहीं गया तो अध्‍यापक व बच्‍चों के पास एक ही बरसों से आजमाया हुआ रास्‍ता बचता है - पहाड़े बोल कर भाग के सवाल हल करने का। तो आप पहाड़े बुलवाइये और भाग सिखाइए क्‍यों इतना परेशान होते हैं बराबर बंटवारा करके भाग सिखाने की मशक्‍क्‍त करने में।लेखकगण रचनावाद से सिखाने का दिखावा करते करते पहाड़ों से भी भाग करने का परिचय  नहीं करवा पाते।

रवि कांत




Sunday, 5 June 2016

मन गणित (कक्षा 5 - प्रश्‍नावली 17.2)




मन गणित वाले पाठ की आखिरी प्रश्‍नावली  17,2 काफी हैरतअंगेज तरीके से बनाई गई है। इससे पिछली प्रश्‍नावली(जिसका फोटो यहां नहीं लगाया गया है)  में भले ही बहुत ही कम जगह रखी गई, लेकिन वहां भी कम से कम चुटकी भर जगह तो छोड़ी गई है जिसमें अगर बच्‍चा उन सवालों को हल कर पाए तो कम से कम किसी तरह लिखने की कोशिश भर तो करे। इस पन्‍ने पर आते ही लेखकों को उतनी जगह छोड़ना भी कबूूल नहीं। 

एक तरह से देखें तो इस प्रश्‍नावली के पहले सवाल के अंतर्गत दिए सभी छह सवाल गलत हैं। क्‍योंकि किसी भी सवाल का जवाब उसके नीचे दिए जवाबों से मेल नहीं खाता। और पाठ पढ़ाते वक्‍त लेखकगणों ने यह तो सिखाया ही नहीं कि दिए गए तीन जवाबों मेें से उपयुक्‍त जवाब न मिले तो क्‍या करें और ना ही उन्‍होंने चौथे विकल्‍प की कोई संभावना रखी है। जैसे 40 में 30 जोड़ने पर 70 आते हैंं लेकिन 1(iii) में दिए गए तीनों जवाबों में 70 केे लिए कोई जगह नहीं है। वहां पर 106, 057 व 086 ने कब्‍जा किया हुआ है जो कि गलत जवाब हैं। 

सवालों की भाषा को जानबूझ कर बोलचाल की भाषा से काट कर रखा गया है ताकि गलती से भी कोई बच्‍चा अगर इसे पढ़ भी ले तो समझने से तीस कोस दूर ही रहे। जैसे, क्‍या संक्रिया कराई जाए कि उत्‍तर 54 प्राप्‍त हो, उत्‍तर सदैव शून्‍य प्राप्‍त हो, दोनों के स्‍थान पर शून्‍य प्राप्‍त है, आदि। वाक्‍य के अंंत में कहीं 'हो' तो कहीं वही हो, 'है' हो जाता है। 

सवाल क्रमांक दो से 2 से 11 तक ऐसे सवाल दिए गए हैं जिन्‍हें हल करने का तरीका पाठ में सिखाया ही नहीं गया। आम तौर पर गणित की पाठ्यपुस्‍तकों में इस रिवाज का ख्‍याल रखा जाता है कि जिस तरह की अवधारणा व सवालों के उदाहरण पाठ में समझाए गए हों उसी तरह के या उससे मिलते जुलते सवालों को प्रश्‍नावली में दिया जाए। ताकि बच्‍चे पाठ में दी गई अवधारणा व उसके साथ दिए गए उदाहरणों को समझ को प्रश्‍नावली में दिए गए सवालों को हल कर सकें। कई बार इक्‍का दुक्‍का ऐसे सवाल भी दिए जाते हैंं जो पाठ में दिए गए उदाहरणों से बनी समझ के सामने चुनौती पेश करके उसे थोड़ा फैलाएं ताकि बच्‍चे चुनौतियों से जूझने का आनंंद महसूस कर सकें। 

लेकिन इस पाठ के संदर्भ में ऐसा लगता है कि लेखकगण इस रिवाज से इत्‍तेफाक नहीं रखते। संभवत: उनकी मान्‍यता यह है कि पाठ में भले ही कुछ भी व कैसे भी पढ़ाया गया हो, अंत में दिए किसी भी किस्‍म के सवालों को हल करने का जिम्‍मा बच्‍चों का है। वैसे ही जैसे शिक्षा व्‍यवस्‍था कैसी भी हो, पास फेल होने का बोझ तो बच्‍चों को ही उठाना है। 

पाठ व प्रश्‍नावली को मिला कर देखें तो ऐसा लगता है कि लेखकगण संभवत: यह मान कर चल रहे हैंं कि यह मन-गणित वन-गणित सरकारी स्‍कूलों के बच्‍चों के बस की चीज तो है नहीं, तो इस पाठ को बनाने में सर खपाने की क्‍या जरूरत है। जैसा तैसा बन जाए वैसा बना दो और किताब में लगा दो क्‍या फर्क पड़ता है। पाठ व उसके अभ्‍यास को बनाने में लेखकगणों, शिक्षा अध्‍ािकारियों व उसे तुरत फुरत छाप देने के लिहाज से प्रकाशकों की लापरवाही के आधार पर भला आप इसके अलावा और किस नतीजे पर पहुंच सकते हैं।

रवि कांत

Saturday, 4 June 2016

मन-गणित (कक्षा 5 अध्‍याय17)


 

कक्षा 5 की पाठ्यपुस्‍तकों का आखिरी पाठ मन-गणित है। मन-गणित यानी गणित के काम काज को मन में कर पाने की काबिलियत। इस लिहाज से इस पाठ का मकसद बच्‍चों में मन-गणित की काबिलि‍यत को विकसित करना होना चाहिए। वैसे मन-गणित अंग्रेजी के मेंटल मैथ का खराब हिंदी अनुवाद है। ज्‍यादा बेहतर होता कि इसका नाम मौखि‍क गणित रखा जाता। इसे देखते ही आप हैरान ही हो सकते हैं कि कक्षा 1 से 4 तक तो मन-गणित पर कोई पाठ नहीं है , कक्षा 5 से 8 तक में भी इस तरह का कोई पाठ नहीं है, अचानक कक्षा 5 में यह पाठ क्‍यों‍कर प्रकट हो गया होगा। क्‍या कक्षा 1 से 4 तक के 6 से 10 साल की उम्र तथा कक्षा 6 से 8 तक के 12 से 14 साल की उम्र के बच्‍चों के साथ इस मुंहजुबानी ग‍णित पर काम करने की जरूरत नहीं है। 10 साल की उम्र में ऐसी क्‍या खास बात है कि इसे लेने की जरूरत पड़ गई है। तो इस पहेली को आप चैन से हल करते रहिए।  

पहली और आखरी बार कक्षा 5 में प्रगट होने के अलावा भी यह पाठ कई किस्‍म की मुसीबतों का मारा है। अभी हम मोटे तौर पर इसके पहले पन्‍ने पर ही बात करेंगे। 

पहली, इस पाठ के विषयवस्‍तु पर ध्‍यान दें तो इसकी मान्‍यता यह है कि संक्रियाओं को छोड़ कर किसी भी अवधारणा में मन-गणित का काम करने की जरूरत नहीं है चाहे वो संख्‍याएं हों या ज्‍यामिति हों या आंकड़े हों या मुद्रा, समय, भार, लंबाई आदि हो। संक्रियाओं में भी जोड़ व घटाव में चार अंकीय संख्‍याओं तक और गुणा व भाग में एक अंकीय संख्‍याओं तक ही मन गणित की जरूरत है। इसके बाद उसकी कोई जरूरत नहीं। इस नतीजे पर लेखक समूह कैसे पहुंचा यह तो वह ही बता सकता है। मेरी जानकारी में अभी तक तो देशी व परदेशी ऐसा कोई शोध उपलब्‍ध नहीं है जो यह बताता हो कि मन-गणित को सिर्फ और सिर्फ कक्षा 5 में तथा 10 साल की उम्र वाले बच्‍चों को ही करवाया जाना चाहिए, ना तो उससे पहले व ना उससे बाद।

दूसरी, मौखिक गणित सिखाने के लिए जो तरीका उदाहरण में चुना गया है वह बहुत ही हास्‍यास्‍पद है। लेखकगण ने एक सवाल लिया है। उसके तीन संभावित उत्‍तर दिए हैं। अब बच्‍चे को यह पता लगाना है कि इनमें से सही जवाब कौनसा है। और इसका तरीका यह बताया गया है कि तीन में से दो गलत जवाबों का पता लगा लो तो बचा हुआ जवाब सही हो जाएगा। अब आप थोड़ी कल्‍पना करिए कि आपको मौखि‍क गणित की जरूरत कब पड़ती है। अक्‍सर आप बाजार में खरीदारी करते हैं, उसी वक्‍त ना। तो इस तरीके से सीखने के बाद आपको करना यह होगा कि अगर आपको कोई दो संख्‍या जोड़नी या गुणा करनी है तो आप दुकानदार से कहें कि तुम तीन विकल्‍प बताओ तभी मैं हिसाब लगा कर बताऊंगा कि तुम्‍हारा कौनसा विकल्‍प सही है। है ना हास्‍यास्‍पद बात। दुकानदार आपकी तरफ देख कर सोचेगा कि किसने आपको बेवक्‍त खुला छोड़ दिया है और आप तरस खाकर खुद ही हिसाब लगा कर बता देगा। लो आपकी मन गणित तो मन की मन में रह गई। यानी यह तरीका एक बहुत ही व्‍यवहारिक तरीके को अव्‍यवहारिक बना देता है। 

तीसरी, उदाहरण के लिए दो सवाल चुने गए हैं, 72 + 4__  = ____ तथा 2__4 – 6__ = ___ । इ सवालों के चयन पर भी कई तरह के सवाल उठते हैं। पहला, अभ्‍यास में दूसरे सवालों के साथ एक अंकीय जोड़ व घटाव के सवाल भी दिए गए हैं लेकिन समझाने के लिए दो या तीन अंकीय जोड़ के सवाल दिए गए हैं। क्‍या यह माना जा रहा है कि एक अंकीय सवाल ज्‍यादा कठिन होते हैं इसलिए उनसे 'सरल' दो या तीन अंकीय सवालों को समझाया जाए। दूसरा, इन सवालों के लिए कोई संदर्भ नहीं बनाया गया है जबकि सवालों को मौखिक तौर पर हल करने की ज्‍यादातर जरूरत रोजमर्रा के कामकाज में पड़ती है। तीसरा, इन सवालों का चयन मौखिक तौर पर सवालों को हल करना सिखाने के लिए किया गया है या अटकाने के लिए। इन सवालों में दो चुनौतियां हैं एक तो संख्‍याओं में छोड़े गए अंक या अंकों का अनुमान लगाना व दूसरा संख्‍याओं के योगफल या शेषफल का अनुमान लगाना। किन्‍हीं दो संख्‍याओं के साथ मौखिक संक्रिया करना ही अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम होता है तिस पर उन संख्‍याओं में से अंकों को गायब करके उसे दोहरा तिहरा चुनौतीपूर्ण करने का मकसद बच्‍चों को कम से कम मौखिक गणि‍त में माहिर बनाना तो नहीं ही हो सकता।

चौथा, लेखक गणों द्वारा अनुमान के लिए लिखी गई बातों पढ़ने पर साफ लगता है कि उन्‍होंने उनके बारे में खुद भी नहीं सोचा है। शायद उनके सर पर भी गणित का भूत इतना सवार रहा हो कि वे एक बार लिखने के बाद दोबारा उसे पढ़ने की हिम्‍मत ना कर पाते हों। जैसे, जोड़ के सवाल के लिए उन्‍होंने एक लड़की से इस तरह विचार करवाया, ‘’पहली संख्‍या 72 है और दूसरी संख्‍या 50 से कम है इसलिए उसकी जोड़ 145 नहीं हो सकती।‘’ इस पूरी बात में सिर्फ पहली बात संख्‍या सवाल देख कर पता चल जाती है। लेकिन दूसरी संख्‍या के बारे में कैसे पता चला कि वह 50 से कम है, इस बारे में कोई विचार या तर्क लेखकों के दिमाग में पैदा नहीं होता। वे उस तर्क को शब्‍दों में नहीं लिखते जिसे पढ़ कर समझ आए कि क्‍यों 4 से आरंभ होने वाली दो अंकों की संख्‍या 50 से छोटी ही होगी। इसी तरह उनके दिमाग में वह विचार भी पैदा नहीं होता जिसकी मदद से इस नतीजे तक पहुंचा जा सके कि 72 व 50 मिल कर 145 नहीं हो सकते। यानी लेखकों ने लड़की को बिना कोई तर्क किए ऐसे नतीजों पर पहुंचा दिया है जिसका बुनियादी तर्क विचार करते वक्‍त उसके पास भाषा में बना ही नहीं। ऐसी ही समस्‍या लड़के द्वारा किए गए तर्क में भी है कि वह जिन नतीजों को सोच रहा है उससे जुड़े बुनियादी तर्क उसके पास नहीं हैं।

पांचवां, इस पूरे पन्‍ने की भाषा ऐसी है कि यह अध्‍यापक को संबोधित है। जैसे, ''अध्‍यापक एक अभ्‍यास बोेर्ड पर लिखते हैं . . . ।'' आप पूछ सकते हैं कि यह किताब बच्‍चों के लिए है या अध्‍यापक के लिए। अगर यह बात बच्‍चोंं को नहीं पढ़नी तो इसमें लिखी क्‍यों गई है। इसी तरह से लेखकों को सवाल व अभ्‍यास का फर्क शायद नहीं पता इसलिए वे सवालों को पूरे पाठ में अभ्‍यास कह कर बुलाते हैं। पाठ में आई बिंदी का हाल यह है कि उसे जहां होना चाहिए वहां नहीं होती जैसे जोड़़ में ड के नीचे और जहां नहीं होना चाहिए वहां आ कर ठसक के साथ बैठ जाती है जैसे हो में मात्रा के साथ। फोंट का ये हाल है कि वो कभी छोटा हो जाता है तो कभी बड़ा, जैैसे उसे यह समझ में नहीं आ रहा हो कि उसे कब किस आकार में रहना चाहिए।  

मन-गणित वाला पाठ इस बात का एक बेहतरीन नमूना है कि ये किताबें किस कदर हड़बड़ी में बनाई गई है। इतनी हड़बड़ी कि संख्‍याओं और संक्रियाओं पर काम करने की कार्यनीतियों को विकसित करने के काम के साथ पाठ्यपुस्‍तक में इस तरह का बरताव किया कि कोई बच्‍चा तो बच्‍चा, अध्‍यापक तक उसका इस्‍तेमाल करने की हिम्‍मत ही ना कर पाए। दुनिया भर में गणित के अभ्‍यासकर्ता व शोधकर्ता संख्‍याओं व संक्रियाओं को समझने के लिए मौखिक कार्यनीतियों को न सिर्फ काम ले रहे हैं बल्कि अपने स्‍कूलों में व्‍यवस्थित तरीके से उस पर काम भी कर रहे हैं। वे न सिर्फ इन पर कार्यनीतियों की मदद से गणित की अवधारणाओं के साथ मौखिक काम करना सिखाते हैं बल्कि मौखिक गणित के वक्‍त काम लिए गए तरीकों व कार्यनीतियों का गणितीय निरूपण करना भी सिखाते हैं ताकि बच्‍चे अपने रोजमर्रा के गणना संबंधी कामकाज का गणितीय निरूपण करने के साथ साथ गणित को अपनी जिंदगी से भी जोड़ कर समझ सके व अपनी गणितीयकरण की काबिलियत को बढ़ा सकें और गणितीय तौर तरीकों से चिंतन करना सीख सके जो कि राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के मुतााबिक गणित शिक्षण का सबसे प्रमुख मकसद है।  

रवि कांत